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Author: Sandeep Kumar Sharma

Sandeep Kumar Sharma
Posts 13
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मेरी फोटोग्राफी और लेखन में प्रयास रहता है कि मैं प्रकृति के उस खिलखिलाते चेहरे को अपने हाथों से छूकर महसूस कर सकूं...। देखता और महसूस करता हूं कि प्रकृति और मेरे बीच में एक रिश्ता बन गया है...वह हंसती है, खिलखिलाती है और उदास होती है तो मैं उसके हर मर्म को सहजता से समझ जाता हूं...। वो उम्मीद से मेरे ओर देखती है...देर तक बातें भी करती है।

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

मजदूरों के बच्चे

मजदूरों के बच्चे पूरा दिन गगनचुंबी इमारतों में धमाल करते [...]

कान्हा से श्रीकृष्ण हो जाना

कान्हा से भगवान श्रीकृष्ण हो जाना एक यात्रा है, एक पथ है, मौन [...]

…वो बचपन, वो तुम्हारी गुटर-गुटर

वो बचपन कैसे भूल सकता हूं और भूल नहीं सकता तुम्हारी [...]

…वो तुम जैसी सांझ

तुम्हारी तरह ही सुरमई, निर्मल, आभा का आंचल खिसकाती ये सांझ, [...]

दहलीज तक आ पहुंची सांझ

ये सांझ कोई गीत गुनगुना रही थी, मेघ आसपास ही मंडरा रहे थे, सूरज [...]

— मैं खिल उठूंगी तुम्हारी छुअन से

...ओ प्रियतम, सुनो ना...। तुम्हारी छुअन के बिना मैं कैसी सूख सी [...]

बारिश तुम्हें आना होगा

सूखती जा रही हैं उम्मीदें सूखती जा रही हैं फसलें सूखती जा [...]

तुम्हारा साथ

तुम्हारा साथ मेरे लिए वैसे ही है जैसे प्रकृति के लिए बारिश [...]

ये भावनाओं का खौफनाक सूखापन

हमने क्या कभी अपने बचपन के बारे में बच्चों को बताया है, कभी [...]

यूं ही तैरते रहो मेरे मन आंगन में

तुम मेरे अरमानों जैसे हो, तुम मेरी जिंदगी के तरानों जैसे [...]

देखो-देखो…प्रकृति ने अपना घूंघट हटा लिया है…

बहुत गर्मी है, लेकिन ये प्रकृति हमारी तरह बैचेन नहीं है, वो [...]

ओ प्रियतम, सुनो ना—

...ओ प्रियतम, सुनो ना...। तुम्हारी छुअन के बिना मैं कैसी सूख सी [...]

ये कैसा अनूठा नेह और विश्वास है

हमने कभी पेड़ के पीछे से लरजते हुए अहसासों को देखा है, हमने कभी [...]