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Author: purushottam sinha

purushottam sinha
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A Banker, A Poet... I love poems...

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

निशा प्रहर में

क्यूँ निशा प्रहर तुम आए हो मन के इस प्रांगण में? रूको! अभी मत [...]

मेरी जन्मभूमि

है ये स्वाभिमान की, जगमगाती सी मेरी जन्मभूमि... स्वतंत्र है [...]

15 अगस्त

ये है 15 अगस्त, स्वतंत्र हो झूमे ये राष्ट्र समस्त! ये है उत्सव, [...]

अनुरोध

मधुर-मधुर इस स्वर में सदा गाते रहना ऐ कोयल.... कूउउ-कूउउ करती [...]

विदाई

विदाई की वेदना में असह्य से गुजरते हुए ये क्षण! भर आई हैं [...]

उम्र की दोपहरी

उम्र की दोपहरी, अब छूने लगी हलके से तन को... सुरमई सांझ सा [...]

चुप सी धड़कन

इस दिल में ही कहीं, इक धड़कन अब चुप सा रहता है! चुप सी अब रहने [...]

अतीत हूँ मैं

अतीत हूँ मैं बस इक तेरा, हूँ कोई वर्तमान नहीं... तुमको याद रहूँ [...]

शहतूत के तले

हाॅ, कई वर्षों बाद मिले थे तुम उसी शहतूत के तले..... अचानक ऑंखें [...]

समर्पण

वो पुष्प! संपूर्ण समर्पित होकर भी, शायद था वो कुछ [...]

कभी

कभी गुजरना तुम भी मन के उस कोने से, विलखता है ये पल-पल, तेरे हो [...]

श्रापमुक्त

कुछ बूँदे! ... जाने क्या जादू कर गई थी? लहलहा उठी थी खुशी से फिर [...]

छलकते बूँद

छलकी हैं बूँदें, छलकी सावन की ठंढी सी हवाएँ.... ऋतु सावन की [...]

विरह के पल

सखी री! विरह की इस पल का है कोई छोर नहीं..... आया था जीवन में वो [...]

परखा हुआ सत्य

फिर क्युँ परखते हो बार-बार तुम इस सत्य की सत्यता? सूर्य की [...]

त्यजित

त्यजित हूँ मै इक, भ्रमित हर क्षण रहूँगा इस प्रेमवन [...]

अचिन्हित तट

ओ मेरे उर की सागर के अचिन्हित से निष्काम तट.... अनगिनत लहर [...]

दूरियाँ

क्यूँ रही दिल के बहुत करीब वो सदियों की दूरियाँ? क्या कोई [...]

टूटते ख्वाहिशों की जिन्दगी

दिखने में नायाब! मगर किसी भी क्षण ढहने को बेताब! बेमिसाल, मगर [...]

उल्लास

इशारों से वो कौन खींच रहा क्षितिज की ओर मेरा मन! पलक्षिण [...]

वक्त के सिमटते दायरे

हैं ये वक्त के सिमटते से दायरे, न जाने ये कहाँ, किस ओर लिए जाए [...]

गूंजे है क्युँ शहनाई

क्युँ गूँजती है वो शहनाई, अभ्र की इन वादियों में? अभ्र पर जब [...]

क्षितिज की ओर

भीगी सी भोर की अलसाई सी किरण, पुरवैयों की पंख पर ओस में नहाई [...]

क्युँ हुई ये सांझ!

आज फिर क्युँ हुई है, ये शाम बोझिल सी दुखदाई? शांत सी बहती वो [...]

वो नव पाती

मृदुल कोमल सकुचाती सी वो इक नव पाती, कोपलों से झांकती, नव बसंत [...]

मन भरमाए

इक इक आहट पर, क्युँ मेरा ये मन भरमाए! तुम न आए, बैरी सजन तुम घर न [...]

पूछूँगा ईश्वर से

सांसों के प्रथम एहसास से, मृत्यु के अन्तिम विश्वास तक तुम [...]

लघु क्षण

हो सके तो! लौटा देना तुम मुझको मेरा वो लघु-क्षण.... क्षण, जिसमें [...]