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Author: प्रतीक सिंह बापना

प्रतीक सिंह बापना
Posts 39
Total Views 1,001
मैं उदयपुर, राजस्थान से एक नवोदित लेखक हूँ। मुझे हिंदी और अंग्रेजी में कविताएं लिखना पसंद है। मैं बिट्स पिलानी से स्नातकोत्तर हूँ और नॉएडा में एक निजी संसथान में कार्यरत हूँ।

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

शायद

शायद किसी दिन मैं उस भीड़ भरे कमरे के उस पर देख पाऊंगा वो जानी [...]

अब

तेरी क़ब्र पर रखे फूल मुरझाने लगे थे अब और मेरे आंसू भी [...]

बन्द दरवाजों के पीछे

मैं दरवाज़े खुल्ले रखता हूँ कि लोग घर में मेरे आ सके हवा को [...]

हम = तुम

हम अल्लाह तुम राम हम गीता तुम क़ुरान हम मस्ज़िद तुम मंदिर हम [...]

सब कुछ तेरा

सितारों का टिमटिमाना चांद का यूँ मुस्कुराना इंद्रधनुष का [...]

मैं हूँ

सारे इंतज़ार की जड़ मैं हूँ हर ज़रूरत की तलब मैं हूँ गुज़रते हुए [...]

मैं और तुम

हम कुछ बिना सोचे समझे से हैं तय किये बिना ही मिले से हैं मैं [...]

खोये हैं हम

कैसी ये बात है कि खोये हैं दोनों ही हम तुम मेरे लफ़्ज़ों में [...]

हमसफ़र

एक ख़्वाब ही था तुम्हें पाना जीवन में था हमेशा से ये डर जो [...]

बारिश की तरह

मेरे दिल ने तुझे हमेशा देखा है बारिश की तरह नाचने को मजबूर [...]

तुम

तुम्हारे सुबह के मैसेज की उम्मीद में अब आंख नहीं खुलती [...]

आज मैंने

जो तुझे मुझे जोड़ता था वो बंधन तोड़ दिया आज मैंने मैं तेरी [...]

कितना खूबसूरत जहाँ है

मैं हरे बाग देखता हूँ, लाल गुलाब भी खिलते हुए उन्हें तेरे और [...]

यही तो मैं चाहता हूँ

नयी उम्मीद का उजाला ना शांत हो वो ज्वाला प्यार के कुछ [...]

साथी

जीवन के सफ़र में उतार चढ़ाव तो हैं न चाहते हुए भी कदम वहां बढ़ [...]

ख़्वाबों में ख़्वाब

मेरी पलकों को चूमते हुए तेरे होठों ने अलविदा कह मुझसे मैंने [...]

मैं तुम्हारा नहीं

मैं तुम्हारा नहीं, ना ही तुम में खोया चाहते हुए भी मैं [...]

समंदर के उस पार

कुछ अजीब अनजान सा है ये समंदर कुछ पंछी कही दूर, कुछ खोये हुए [...]

आवारा बादल

तन्हा भटकता आवारा बादल सा मैं वादियों-पहाड़ों के ऊपर से [...]

मैं उड़ता रहूँगा, उठता रहूँगा

इतिहास के पन्नों में लिख दो या अपने झूठे सच्चे शब्दों [...]

तुझे शायद पता ही नहीं

तुझे शायद पता ही नहीं किस तरह जीता हूँ तुझे मैं सुबह शाम दिन [...]

काश मैं उसे फिर देख पाऊँ

कक्षा की खिड़की से बाहर मैंने आज उसे खड़े देखा कुछ परेशान [...]

जीवन बेहतर है

जीवन से निराश एक शाम मैं नदी किनारे बैठा सोचने की कोशिश [...]

बोझ

वो जिन्हें तुम जानते हो वो जिनसे तुम मिलते हो वो भी अपने साथ [...]

मेरे देश का किसान

गर्मियों की ढलती शाम को उसके बदन पर जमी मिट्टी कपड़ो से कुछ [...]

आज फ़िर तेरी याद ने

आज फ़िर तेरी याद ने वो खोया हुआ पल लौटा दिया आज फ़िर तेरी याद [...]

तुझे शायद पता ही नहीं

तुझे शायद पता ही नहीं किस तरह जीता हूँ तुझे मैं सुबह शाम दिन [...]

बेबस यादें

कभी खुशनुमा, कभी दुखभरी भावनाएं हर तरह की बढ़ती उम्र के साथ [...]

प्यार काफ़ी है

मानता हूँ कि इस संसार में कई खामियां हैं पर प्यार काफी है सब [...]

मैं तुम्हें फिर मिलूंगा

मैं तुम्हें फिर मिलूंगा, कहाँ, कैसे, कुछ पता नहीं शायद [...]