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Author: Neeraj Chauhan

Neeraj Chauhan
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कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।

विधाएं

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कविता (41 Posts)


अपनों की चोट! (रोहिंग्या पर आधारित)

धराशाही हो गयी थी तुम्हारी वसुधैव कुटुम्बकम की धारणा जब [...]

कुर्बानी!

ये कैसा त्यौहार? धर्म के नाम पर, मासूमों की गर्दनों पर [...]

संकट और तरबूज़

तरबूज़ से हम; संकटों के चाकुओं से लोहा लेते बार [...]

माँ तुम मरी नहीं .. .

तुम्हारा हाथ मुझसे क्या छूटा, मानों विधाता मुझसे रूठा बाढ़ [...]

ये मथुरा की धरती हैं साहब !

ये मथुरा की धरती हैं साहब! जीवित हैं यहाँ कृष्ण की [...]

स्याह दीवारें !

अपनी धरती के क्षितिज से कही भी देखता हूँ, कीड़े-मकोड़े सी [...]

साम । दाम । दंड । भेद !

भाई, सांई?, कम, कसाई! स्व, क्रुद्ध, कंठ, रुद्ध! चिन्त, चम्भ, [...]

चोटीकटवा !

अफवाहों को अगर थोड़ा दरकिनार करूँ, तो पाता हूँ की चोटी हर [...]

समय लगेगा !

झुकेगा दम्भ, समय लगेगा, हटेगा बंद , समय लगेगा गिरूंगा आज, [...]

क्योंकि मरना तुम्हारी हद हैं!

आँखे फाड़ लक्ष्य को ताड़, जिद पर अड़ दुःखों से लड़, काटों पर [...]

‘उनसे’ ज्यादा भुखमरे!

मेरे देश की लोकतंत्रीय चक्की में तुम घुन से लगे हो, तुम्हारी [...]

लगा, गलत हूँ! 😢

पता चली जो गलत लिखाई, लगा गलत हूँ तुमने हटा आरी सी चलाई, लगा [...]

तुम समझती क्यों नही माँ?

तुम्हारे एक आंसू की बूंद मेरेे दिल को चीर देती है, बढ़ा मेरी [...]

भैंस का दर्द! (एक गंभीर कविता)

धार्मिक अनुष्ठानों और तीक्ष्ण कानूनों से, गाय तो हो गयी हैं [...]

कन्यादान

नही कर्ण भी समता रखता नही कर्ण का दान महान, सब दानों से बढ़कर [...]

समयातीत

जीवन की वेदी पर दुखाग्नि के हवन में समय की आहुतियाँ देता [...]

और तुम कहते हो कि तुम सुखी हो !

तुम केवल बाहर से हँसते हो, दिखावटी.. अंदर से बेहद खोखले हो [...]

निकृष्ट कवितायेँ !

व्यापक नही हैं संकुचित हैं अब, 'कविताओं का दायरा' यहाँ अब भी [...]

कटुसत्य

चमक भी पैसा दमक भी पैसा आटा भी पैसा नमक भी पैसा नाम भी [...]

प्रेम की परिभाषा

प्रेम नहीं शादी का बंधन प्रेम नहीं रस्मों की अड़चन, प्रेम [...]

गरीब का ए. टी. एम्.

मेरे देश का गरीब, वह ए. टी. एम्. है जिसमे लगता है जब भी शासन की [...]

माँ और बाप

आस्थाओं की आस्था प्रेम की पराकाष्ठा निज का दफ़न ताप, माँ और [...]

आदमी की औक़ात

सिरे से खारिज़ कर बैठता हूँ, जब सुनता हूँ की चौरासी लाख [...]

मैं यूँ तो “भीष्म प्रतिज्ञ” नहीं !

मैं यूँ तो "भीष्म प्रतिज्ञ" नहीं, जो वचनों पर डटता आता .. हाँ [...]

कभी हार कर भी तुम्हे पा लिया..

कभी हार कर भी तुम्हे पा लिया, कभी जीत कर भी मुँह की खानी [...]

कपकपाती थरथराती ये सज़ा क्यों है?

कपकपाती थरथराती ये सज़ा क्यों है फिर भी ठंड का इतना मज़ा [...]

माँ तुम एयरपोट न आना.. .

सेना से गर फ़ोन जो आये मैं ना बोलू और बताये पागल सी तू पता [...]

तुम लगी घाव पर मरहम सी..

मेरे सुख दुख से परिचित सी एक गूढ़ नियंता बन बैठी, तुम लगी घाव [...]

प्रेम का ‘सैक्सी’करण !

जिस दिन मुन्नी की बदनामी को हंस कर देश ने स्वीकारा था जिस दिन [...]

‘साहित्यपीडिया’ का कहर !

बदस्तूर जारी हैं साहित्यपीडिया का कहर, इस कदर की कल तक जो [...]