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Author: मंजूषा मन

मंजूषा मन
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मैं मंजूषा मन, लेखन ही मेरा जीवन है, मन ने जो महसूसा वह लिख दिया। जीवन के खट्टे मीठे और कड़वे अनुभवों का परिणाम है मेरी कविता, मेरा लेखन।

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

एक मुक्तक..

दिल को इसमें बड़ी ही राहत हो। रात दिन तेरी ही इबादत हो। सौ [...]

ज़िंदाबाद

एक मई पर.... ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद मजदूर दिवस [...]

कविता

और दर्द दो तुम मुझे और दर्द दो और ज़ख्म दो और दो पीड़ा ये [...]

दोहा

दोहा खेवनहारा आप ही, छोड़े जब मझधार। कैसे हो पाए कहो, जीवन [...]

तुम्हारी यादें

तुम्हारी यादें जंगल सी घनी हैं तुम्हारी यादें ऊँचे ऊँचे [...]

बेटियाँ

बेटियाँ बेटियाँ, बचपन से ही अपने माता पिता की 'माँ' बन जातीं [...]

नमक

दाल में चुटकी भर नमक की घट- बढ़, पल में पहचान लेते हो [...]