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Author: Laxminarayan Gupta

Laxminarayan Gupta
Posts 27
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मूलतः ग्वालियर का होने के कारण सम्पूर्ण शिक्षा वहीँ हुई| लेखापरीक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत होने के बाद साहित्य सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हुआ|

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

देश भक्ति की विजय गुँजाना

किसके नाम लिखूँ मैं पाती तूँ ही बता पवन वासन्ती मन मन जहर [...]

कुछ दोहे

कविता किरकी कांच जस, हर किरके को मोह । छपने की लोकेषणा, करे [...]

लगे सभी कुर्सी कब्जाने

यहाँ चली है बहस गधों पर कब्रिस्तानों, श्मशानों पर साइकिल- [...]

राजनैतिक विष

कैसे कैसे पागल नेता, कुछ भी कहते रहते हैं । और हम, पिछलग्गू [...]

प्रवासी भारतीयों से

अपनी जन्म भूमि से दूरी सात समुंदर दूर वहाँ । कैसे रह लेते हो [...]

घी उधार का पीने वाले

कहने की बातें कुछ और करने की बातें कुछ और आजादी के बाद देश में [...]

मेरा अभिषाप

गीत चल दिये जाओ.... मैं रोक नहीं सकता तुमको पर ध्यान रखो तुम [...]

अधिक न टिका अंधेरा

समय समय का फेरा, अधिक न टिका अंधेरा दीपक की बाती ने जल कर रात [...]

उम्र बहुत थोडी पाते हैं

यदा कदा ही तो आते हैं भारत के रख वाले उम्र बहुत थोड़ी पाते हैं, [...]

प्रभु के चरण

माना है जब से सुख को सपन दुःख में भी खुश हैं तब से अपन सामर्थ [...]

भ्रम

भ्रम मानव मन ने निराकार के, जो जो रूप गढ़े पीढ़ी दर पीढ़ी ने [...]

……की तरह

भाड़े की भीड़ जाडे‌ की धूप अधिक साथ नहीं देती खुशियों की [...]

फिर वसन्त आया …

सूरज की किरणों ने पोर पोर चूमा अलसाया सूर्य-कमल मस्ती में [...]

मेरी बेटी

बेटों से ज्यादा मां बाप को प्यार करे मेरी बेटी दो घरों का [...]

राष्ट् कवि मैथिली शरण गुप्त ( जन्म : ३ अगस्त १८८६)

चिर प्रतिष्ठा चिरगांव गाँव को देने वाले 'दद्दा' देश नमन करता [...]

धरती माँ

धरती धर ती कितना बोझा नहीं कभी हमने ये सोचा भेदभाव के बिना [...]

अम्बर पुकारे

गतिशील रहना धरती सिखाये निस्वार्थ सेवा सूरज सिखाये चलती [...]

कुण्डलियाँ

मानवीय सद्गुणों से, हुए कभी परतंत्र सदियों के संघर्ष से, [...]

दोहे

कविता किरकी कांच जस, हर किरके को मोह छपने की लोकेषणा, करे छंद [...]

पावस बहुत रुलाती हो

पावस बहुत रुलाती हो तरसा तरसा कर आती हो पीली चमड़ी वाली [...]

कागा केंद्रित पद

(१) सखी री पहुँन भये पिया कागा जब जब गाये अटरिया, आते तबहि [...]

कोई नहीं पाले अनुशासन

कोई नहीं पाले अनुशासन ना मैं, ना तुम, और न हम सब अभिभावक जन | [...]

मन उड़ने का है

आज हवा में बिना पंख के मन उड़ने का है बीते कल से आज पुन:, मन [...]

प्रश्न पूछते थकते पांव

प्रश्न पूछते थकते पांव कितनी दूर रहा अब गाँव पद चिन्हों पर [...]

बुझती मशाल -जलतीं मशालें

परतंत्र-काल में जली देश-भक्ति की मशाल काजल की कोठरी में [...]

सम-सामयिक दोहे

सहिष्णु नर होता सफल, पकड़ सबूरी डोर| असहिष्णु नर ढोर सम, चरता [...]

कतरनें

कतरनें जोड़ीं बहुत पढ़ न पाये एक भी खोखले कर रख दिए आवधिक [...]