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Author: मुकेश कुमार बड़गैयाँ

मुकेश कुमार बड़गैयाँ
Posts 24
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I am mukesh kumarBadgaiyan ;a teacher of language . I consider myself a student & would remain a student throughout my life.

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

आदमी रोज उठता है …….

आदमी रोज उठता है घडी के इशारे पर... प्रतिदिन वही करता है जो रोज [...]

अरे धूर्त!

अरे धूर्त...... धिक्कार है है तुम पर... कौऐ को भी पीछे कर गये.... वो [...]

उड़ी बाबा !

एक बाबा, दूसरा बाबा और फिर तीसरा बाबा---! उडी बाबा- [...]

फिर आऊँगा ….

मैं नाम बदल फिर आऊँगा ! किसी दरख्त का फूल बनकर अंबर का तारा [...]

काँटे!

हमने काँटो को बुरा कहा है एक बार नहीं, बार बार ! मैंने जरा गौर [...]

हवा हूँ मैं !

मेरे अंदाज ही कुछ अलग हैं आज यहाँ, कल वहाँ- - - पता नहीं फिर [...]

थोड़ी सी चटनी!

थोड़ी सी चटनी ! थोड़ा सा पापड़ जरा सी सलाद जिंदगी भी कुछ यूँ [...]

वन से आया विद्यार्थी

कक्षा के आखिरी कोने में सहमा सा ,उपेक्षित ,अकेला किंतु आँखों [...]

पूज्यवर गुरुवर तुम्हें प्रणाम!

पूज्यवर गुरुवर तुम्हें प्रणाम! खोलो नव आयाम --- घनघोर अंधेरा [...]

कौन हो तुम!

यह कौन है ?जो मौन सतत पर बोलता है अनवरत! कौन है मन के गहरे कोने [...]

तथ्य जान लो,सत्य जान लो—–

बंधु मेरे ! पहले तथ्य जान ले--- पूरा-पूरा सत्य जान ले न गाल बजा, [...]

माँ

हे माँ --- प्यारी माँ! सोचता हूँ, कविता लिखूँ? किस्सा-कहानी [...]

रफू की दुकान

अनिमेष कई दिनों से अपनी अजीज कमीज पर रफू करवाने के बारे में [...]

संस्मरण :जंगल का प्रसाद

प्रसाद, कहीं भी बँट रहा हो---कितनी भी भीड़ हो, कहीं भी,कैसे [...]

आसमान में चितकबरे चित्र!

आसमान में बादलों के चितकबरे चित्र कभी लगे कि शेर तो कभी [...]

— चश्मा उतारकर देखो!

कटप्पा-बाहुबली आईपीएल देशविदेश जाति ,धर्म [...]

भोर से पहले—-

समय चूक जाये पर वो नहीं रुकती उजाले से पहले भोर से पहले आ [...]

होली:भावनाओं के रंग!

हम घर किसे कहते हैं पता है आपको? चार दीवारें ,चिकना फर्श,गेट पर [...]

शेष तुम विशेष तुम!

अस्तित्व में तुम अभी अस्तित्व भी न रहे पर तुम रहोगे जब सब [...]

चेहरे कहां दिखते हैं?

रंग-बिरंगे सौ किस्मों के नीले- काले लाल- गुलाबी कैसे [...]

मित्र का अनुरोध :कुछ राजनीति पर बोलो

मित्र क्या कहूँ? क्या बोलूं ? राजनीति पर खेल मदारी का डमडम [...]

शीर्षक ढूँढ़ता हूँ- – –

शब्दों से भरी इस दुनिया में शीर्षक ढूढ़ता हूँ कभी सोचता हूँ [...]

सुबह सुबह सूरज और मैं —

सुबह सुबह जब मैं सूरज के सामने होता हूँ स्वयं को बड़ा ही छोटा [...]

बेटियाँ:जीवन में प्राण

बेटियाँ जीवन में प्राण हैं प्रभु की प्रतिकृति सरस्वती [...]