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Author: Kokila Agarwal

Kokila Agarwal
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House wife, M. A , B. Ed., Fond of Reading & Writing

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

कफ़न

मुस्कुरा जब जब बढ़ाया इक कदम तूफ़ान नज़रों में समाया दम- ब- [...]

मन

कभी सोचो कि पल दो पल जियें खुद के लिये यारो कभी सोचो कि कोई [...]

मैं

हर लम्हा पुकारती हूं मैं.. हर लम्हा हारती हूं मैं.. समझ न [...]

मैं

गुज़रती हूं अंधेरो से लिये तक़दीर हाथों में बिखरती हूं [...]

काश मुझे भी बिटिया होती

रचनाकार- Kokila Agarwal विधा- कविता काश मुझे भी बिटिया होती उसकी [...]

मन

मन --- आंख खोल जब वो मुस्काया प्रथम परिचय बंदिश का [...]

काश मुझे भी बिटिया होती

काश मुझे भी बिटिया होती उसकी आंखो में खुद को जीती महकी मेरी [...]

मुक्तक

ज्ञान पिपासा भोले पंछी चुग चुगके सब पान लिया आत्मसात करके [...]

गया साल

गया साल हर ले गया कुछ झूठी उम्मीदो की आस जीवन का रास छोड़ [...]

सत्रह

छ:छ: पांच सत्रह का एक दांव शकुनि का क्या बोल गया विवश हुआ [...]

ज़िंदगी यूं भी मिलेगी

ज़िंदगी यूं भी मिलेगी ये कभी सोचा न था लम्हा लम्हा बिंध [...]

बांझ

सुमन गर्म कपड़ो का संदूक खोले कितनी देर से बैठी थी। बेटे का [...]

क्या करे

क्या करे---- खुशी , कैसी खुशी अर्जित कर रहा था अखिल जो किसी के [...]

अंतहीन यात्रा

शरीर, क्या है, बस जन्म लेने का माध्यम या फिर एक सौभाग्य भी जन्म [...]

नंगे पांव

अंजिली आखिर कितनी देर आंसुओं से तन मन भिगोती , रात कब तक अपनी [...]

जीवन साथी

छीना मेरे अधिकारो को बोलो तुमने क्या पाया साथी बन यूं साथ [...]

अनकही

छीन मेरे अधिकारो को बोलो तुमने क्या पाया साथी बन यूं साथ [...]

बचपन

मैं अक्सर सोचती हूं रात के गहरे अंधेरो में न जाने क्यूं वो [...]

स्तब्ध

छवियां तो धूमिल हो जातीं हैं पर प्रेम समर्पण अब [...]

बाल दिवस पर

चलो बचपन की यादों को खुदी से बांट लूं मैं आज पलको में सजे [...]

अंतर्द्वंद

किसी का किसी पर कैसा अधिकार मैं तू से या तू मैं से जीवन्त [...]

पत्नियो के नाम

आज की रचना पत्नियों के नाम-- तिनका तिनका जोड़कर पत्नी जी [...]

आस

पांच साल बाद बेटा बहू और पोते को लेकर दिवाली पर घर आ रहा था। [...]

चारदिवारी

गुज़रते गुज़रते ज़िंदगी कहां आ गई है। सब समेटने में कब सब [...]

दोहे

जीवन की ये चाकरी मुझको नहीं सुहाय थामूं बहिया अापकी मुझको [...]

कोहरा

बहुत सोचा कि अश्को को भुला फिर मुस्कुराऊंगी कभी मुझसे कभी [...]

सोच

सोचती थी क्या तुम्हारी सुगंध को मेरी खुशबू रास आयेगी क्या [...]

झूठ सच से क्या बोलता रहा

झूठ सच से क्या बोलता रहा सच सच न रहा झूठ बन गया नफरतों की [...]

विलाप

विलाप ये कैसा विलाप मद्धम स्वर की चीत्कारें अंतरिक्ष में [...]

सोच

कभी कभी सोचती हूं भगवान सुनता है क्या बहुत ही छोटी होती है [...]