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Author: DrRaghunath Mishr

DrRaghunath Mishr
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डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' अधिवक्ता/साहित्यकार/ग़ज़लकार/व्यक्तित्व विकास परामर्शी /समाज शाश्त्री /नाट्यकर्मी प्रकाशन : दो ग़ज़ल संग्रह :1.'सोच ले तू किधर जा रहा है 2.प्राण-पखेरू उपरोक्त सहित 25 सामूहिक काव्य संकलनों में शामिल

विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

‘सहज’ के दो मुक्तक

1. मुक्तक : 000 कर्म में विस्वाश कर. तनिक दिल में धीर धर. राह [...]

कालजयी बन जाओ

कालजयी बन जाओ: एक यथार्थ परक मुक्त छन्द [...]

ग़ज़ल

जीभ से जो हुआ, जख़्म भरता नहीं। दिल हो जब उदास, धीर धरता [...]

मुक्त छन्द रचना -कालजयी बन जाएँ

कालजयी बन जाओ: एक यथार्थ परक मुक्त छन्द [...]

डा०रघुनाथ मिश्र ‘सहज’ के चुनिन्दा मुक्तक

1.रखना खुश दिल रहना हिल मिल तोड़ना आसान, जोड़ना मुश्किल. [...]

गीतिका:

बड़े - बड़ों को, आइना दिखा दिया हमने. हँसना - रोना, व गाना सिखा [...]

कुण्डलिया छंद

जागो प्रियवर मीत रे, कर लें रवि से प्रीत। क्या रक्खा उतपात [...]

‘सहज’ के दोहे -खामोशी

खामोशी पसरी रही,लोग रहे भयभीत। दूर-दूर तक मौन थे,छन्द-ग़ज़ल औ [...]

अन्दर कुछ गुल खिले

ह्रदय से ह्रदय मिले. दीप से दीप जले. दूर या पास [...]

बेटी है श्रिष्टा का आधार

बेटी है श्रिष्टि का आधार। बेटी स्वयम् है अथाह प्यार। बेटी [...]

बेटी है श्रिष्टि का आधार

बेटी है श्रिष्टि का आधार। बेटी स्वयम् है अथाह प्यार। बेटी [...]

यदि

कोयल की कूक मयूर की थिरक रिमझिम सावन की खुशबू मधुबन की सच [...]

अक्षम्य है

परिणाम गलती का गलत ही होगा अंततः जानकर की गई गलती अक्षम्य [...]

ग़ज़ल

जला है दिया, अब अंधेरा हटेगा. सुखों पर लगा है,वो पहरा [...]

मुक्त छंद कविता

हंस की अंतर्ध्वनि : 000 मैं खुश हूँ 000 जिन्दगी! शुक्रिया [...]

ग़ज़ल:

चिराग लेके मैं खुद ही को, खोजता यारो । कर्ज़ के बोझ पे [...]

गीतिका

जीना -जीकर मर जाना , भैया यह क्या बात हुई. कठिन समय में डर [...]

कुण्डलिया छंद

डरता सत्य नहीं कभी, वह होता बेबाक. वह हरगिज़ झुकता नहीं,होती [...]

ग़ज़ल

2122 2122 2122 212 मात्र भर 26 यति 14,12 क्या करूँ किससे कहूँ मैं, बात कोई ख़ास [...]

मुक्तक

क़ैदखाने में कहाँ है, शुद्ध जल- ताज़ी हवा. छिन गई मजलूम से [...]

‘सहज’ के दो मुक्तक:

(एक) बंद आँखों से दिखेगा. कब उजाला. बंद होगा छीनना, कबसे [...]

बेटी-छंद मुक्त कविता

घर परिवार माता-पिता दो-दो घरों की रौनक होती है बेटी. समाज [...]

मुक्तक:

वरिष्ट सिखाएं-नवोदित सीखें -मिशन है हमारा. सब ही एक दुसरे [...]

मुक्तक:

तुझे जी-जान से चाहा. मान-सम्मान से चाहा. सजदा न किया-सच है [...]

दोहा मुक्तक

आयी बाढ़ बहे सभी, सपने औ अरमान. छिना खेत-गिरवी हुआ, सर्व [...]

ग़ज़ल:

किसने लगाई आग, और किस -किस का घर जला. मेरे शहर के अम्न पे , कैसा [...]

.मुक्त छंद रचना: बेटी

माँ - बाप की आँखों का नूर पिता का स्वाभिमान समाज का [...]

ग़ज़ल:

ग़ज़ल: ०००० शब्द मूल्यहीन हो गया. कथ्य शिल्पहीन हो गया. कल तलक [...]

हरगीतिका- मात्रा भार 28

संसार के दुख-दर्द का है, अंत आखिर अब कहाँ। खुशियाँ बाँटें [...]

तरही ग़ज़ल

लगाये पंख सपनों के, गगन की हूर होती है. चले जब वक़्त का चाबुक, [...]