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Author: arti lohani

arti lohani
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विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

प्रेम

प्रेम क्या है? समर्पण मात्र या अर्पण। प्रेम भावों का तीव्र [...]

प्रकृति

शिखरिणी छंद । सघन वन । खोते अस्तित्व । भीगे नयन ।। कैसे हो [...]

वो एक नदी

हिमखंडों से पिघलकर, पर्वतों से उतरकर, खेत-खलिहानों को [...]

ख्वाइशें

ख्वाइशों का खिला आसमान है, दुआओं के उठे हजारों हाथ भी, एक भी [...]

ख्वाहिशें

ख्वाइशों का खिला आसमान है, दुआओं के उठे हजारों हाथ भी, एक भी [...]

कुछ नही पहले सा

इस शाख तो कभी उस शाख उड़ती थी पहले खत्म होती धरा में अब उदास सी [...]

रोटी की जद्दोजहद

दो रोटी की जद्दोजहद में । सुबह से रात हुई ।तलाशने निकले घर से [...]

कागज की कश्ती

किसी ने भेजकर कागज की कश्ती बुलाया है समन्दर पार मुझे. वो [...]

मानसून

आयी बरसा। उदास किसान का । मन हरषा ।। आग का गोला । देता है ये [...]

क्या उत्तर दोगे ज़माने को

उदासी थी सिसक रही, मेरे ही लफ्जों में। जैसे की मैं दफ़्न हूँ [...]

कहाँ आ गए हम

ये कौन सी मंजिल,कहाँ आ गये हम. धरा है या क्षितिज,जिसे पा गये [...]

अंतर्मन की पीड़ा

किसे और कैसे बतलाऊँ किसे और कैसे बतलाऊँ अन्तर्मन की पीडा [...]

हाइकु

राम का राज। सब एक समान। सँवारे काज।। नीले कृष्णा । गोपियों [...]

नारी बस यूँ ही छली गयी

बना देवी पूजा सदा मुझे, सदियों से ये ही रीत रही। मिला न [...]

कोई शख्स पराया नहीं।

कोई शख्स जग में पराया नहीं। अब तक किसी ने बुलाया नहीं। मैं [...]

मदहोश

तेरी ऊँगलियों की शरारत, मुझे मदहोश करने लगी. तेरी साँसों की [...]

हमसफर तुम

इस सफ़र के नये हमसफर तुम हो, कि अब तो हर जनम के हमसफर हो [...]

तन्हाई

तन्हा बैठी थी तन्हाई मैं, याद उनकी आई तन्हाई मैं. तुम कहाँ और [...]

कैसी ये रीत

आज डोली विदा हो रही है आज बेटी बहू बन रही है कल तक थी जिगर का [...]

मेरा गाँव

चलो ले चलूँ तुम्हें हसीन वादियों में, इस आपाधापी से दूर [...]

मैं नारी हूँ

मैं ममता की शीतल छाँव हूँ,तो सूरज की तपिश भी. निर्मल अविरल नदी [...]

बेटियाँ

हरमन को मनभावन लगती हैं बेटियाँ, माँ पिता के दिल में बसती हैं [...]

अजब ये प्रीत है.

धरती प्यासी है मिलन को अपने अंबर से, अंबर भी बेकरार है प्रणय [...]

कागज की कश्ती

भेजकर उसने कागज की कश्ती बुलाया है समन्दर पार मुझे वो नादाँ [...]

ओ अजनबी…

ओ अजनबी क्या तुम सचमुच अजनबी हो? वक्त-बेवक्त आ जाते हो [...]

रुह को रुह में उतरने दो

आज लबों को बोलने की इजाज़त नहीं आंखो को ये काम करने दो करीब आ [...]

कौन हो तुम

कौन हो तुम जो चुपके से अंदर चले आ रहे हो कौन हो तुम जो बिन [...]