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Author: aparna thapliyal

aparna thapliyal
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विधाएं

गीतगज़ल/गीतिकाकवितामुक्तककुण्डलियाकहानीलघु कथालेखदोहेशेरकव्वालीतेवरीहाइकुअन्य

चाहिए राष्ट्रभाषा

पूरी करने को राष्ट्र की आशा हर देश को चाहिए निज की एक भाषा यह [...]

“सिय ,पिय की बाट जोहती”

. कंकेली छाँह बैठ सिय ,पिय की बाट जोहती आवें प्रिय ,हो [...]

“आँसू”

आँसुओं की अपनी ही जुबान होती है, हर आँसू के दिल में छिपी इक [...]

शिक्षक

शिक्षक जो स्वयम् को जला कर, स्वयम् को गला कर जहाँ को रौशन [...]

स्त्री/ पुरुष

रोहिणी के आफिस में आज वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह का [...]

१– वो कुत्ता ही था ?

हम लोगों ने बहुत से जानवरों को बहुत करीब से देखा है ,कभी कभी [...]

” क्यों”

आज संभाग में कठपुतली चंद जी का वार्षिक दौरा था,उनके पहुँचने [...]

कुल दीपक

निरंजन की पडोस वाली भाभीजी आज जैसे तय करके आईं थी कि उसे समझा [...]

“मानवता”

कौन कहता है कि मानवता मिट चुकी है कहीं कहीं पर ये सो गई है खास [...]

मेरा पुनर्जन्म

आज भी .याद है वो पल मुझको अपनी कोख से जब जाया था तुझको उस वक्त [...]

सौभाग्य” (लघु कथा)

आज बेटे की ईन्जिनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने पर उसके [...]

मनभावन सावन

१ बूँदों का नृत्य सोंधी मिट्टी महकी हवा बहकी । ##################### [...]

अहसास

जुबाँ खा़मोश रहकर भी सभी कुछ बोलती है मगर बस शर्त ऐसी है कि [...]

विधाता की पाती

तितली और खगकुल रंगों के ऐसे गुरुकुल अप्रतिम सुन्दरता [...]

सुनो बलात्कारी

सूरज भी खुश नहीं आग बरसा रहा निर्लज्ज निकम्मों को सबक देना [...]

कश्मीर का दर्द-२

शहीद ले.उमर फैयाज़ को समर्पित (५ हाइकु) १ झेलम तीरे पहले [...]

छोटी छोटी बातें

पानी आँखों के समंदर मे हहराता खारा पानी निशब्द रह कर भी सुना [...]

बेटी

सुगंधा को आज पहली बार महसूस हुआ कि वो अवांछनीय ,अकेली नहीं [...]

करनी और भरनी

आज पुराने घर के आँगन में अकेली निस्सहाय बैठी शगुन के हृदय में [...]

शाईलक के भतीजों, धुआँ

"शाईलक के भतीजों" काली बिल्ली बनकर रास्ता काट लो बन जाओ बन्दर [...]

मुग्धा

कलियों से कोमलता पाई लचक वल्लरी से आई गात महकती फूलों [...]

“दण्ड”

नयन आज बहुत खुश था,उसके तेरहवें जन्मदिवस पर मामाजी उपहार में [...]

ओस

पत्तों पर ठहरी ओस की बूँदें नाजुक हल्की सी हवा से [...]

” सरप्राइज़”

सुबह सुबह सबको यथास्थान दफ्तर,स्कूल भेजकर निवृत हुई तो सोचा [...]

कश्मीर का दर्द (५ हाइकु)

#१ सेब के फूल सुगन्धित सजीले मस्तक शूल । ***************************** [...]

“विडम्बना”

देवालय में स्थापित पाषाण कृति पूजित होती नित नतमस्तक [...]

शब्दों का खेला

"शब्दों का खेला" शब्द हथियार है ं बेसोचे उछाल दो तो दोधारी [...]

“रक्षा कवच”

सत्या के अति इमानदार पिता यूँ तो सरकारी महकमें में [...]

‘ पितृ भोज’

१९८८ में मैं नई नई, दिल्ली शहर में रहने आईं थी.मन मे राजधानी की [...]

“मेरे लिए”

ज़िदगी नें कुछ यूँ साथ निभाया है मेरी किस्मत देख कर सूरज [...]