वो एक अकेली पर, दो घर को संजोये है

रजनी मलिक

रचनाकार- रजनी मलिक

विधा- गज़ल/गीतिका

"वो एक अकेली पर ,दो घर को संजोये है।
अनमोल खजाना है,बेटी में जो पाए है।"
ये रस्म विदा की इक आँगन से हुई जब भी,
छूटे वही सब रिश्ते,जो प्यार से बोये है।
वो छाव हुई आँचल,की अब है पराई माँ,
पुर धूप में हम जिसमें,बस चैन से सोये है।
दहलीज से बेटी को ,बस देख रहे बाबा,
कह पाए नहीं कुछ भी,वो आँख भिगोये है।
#रजनी

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रजनी मलिक
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योग्यता-M.sc (maths) संगीत;लेखन, साहित्य में विशेष रूचि "मुझे उन शब्दों की तलाश है;जो सिर्फ मेरे हो।"

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