500 और 1000/मंदीप

Mandeep Kumar

रचनाकार- Mandeep Kumar

विधा- कविता

500 और 1000/मंदीप

देखो मच गया आज फिर हाहाकार,
पाँच सौ और हजार के नोटो पर सब कर रहे विचार।

समय का चक्र ऐसा चला,
हजार का नोट भी हुआ लाचार।

करते थे जो गमंड काले धन पर,
धन वो हो गया आज सब बेकार।

होगा ना अब कभी इकट्टा काला धन,
देखो चिप वाले नोट ले आई मोदी सरकार।

ना बिगड़ा"मंदीप" कुछ भी बेइमानो का,
या तो फिर से पड़ी आम आदमी पर मार।

मंदीपसाई

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Mandeep Kumar
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नाम-मंदीप कुमार जन्म-10/2/1993 रूचि-लिखने और पढ़ाने में रूचि है। sirmandeepkumarsingh@gmail.com Twitter-@sirmandeepkuma2 हर बार अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ। और रही बात हम तो अपना दर्द लिखते है।मेरा समदिल मेरे से खुश है तो मेरी रचना उस के दिल का बखान करेगी।और जब वो रूठता है तो मै मेरे दिल का बखान करूँगा।हा पर बहुत अच्छा है वो और मेरे दिल में उस के लिए खास ही जगह है ।जहाँ तक कोई पहुँच भी नही पायेगा। मेरा दिल जरूर दुःखता है पर मेरा दिल उसे बार बार माफ़ कर देता है।

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