2.मानवता

Versha Varshney

रचनाकार- Versha Varshney

विधा- कविता

क्या जमाना आ गया खो गयी है मानवता ,
देख रहे जलते किसी को बचाने की फ़िक्र नहीं ,
मशगूल हैं वीडियो बनाने में, जिंदगी का मोल नहीं ।
गरीबी और अमीरी की कैसी है ये लड़ाई ,
ढो रहा पत्नी के शव को ,वो "दाना मांझी ",
किसी को उसकी फ़िक्र नहीं।
कहाँ सो गए गरीबों के रखवाले ,
विलुप्त हो गयी मानवता ।
हैरान हूं ये सोचकर ,क्या जंगल था वो इतना घना ?
चल रहा था एक मानव ,लाश को कंधे पर उठाये ,
क्या कोई नहीं था मानव वहां ?
हताश हूँ ये सोचकर ,क्यों नहीं आयी उनको दया ,
जब तोड़ रहे थे ,वृद्धा की हड्डी ,
क्या मर गयी थी मानवता ।
लगता है कृष्णा ,घोर कलयुग आ गया ,
आज तेरे भारत में राक्षसों का बोलबाला हो गया ।
शर्म आती है आज हमको खुद को इंसान कहने में ,
मानवता के नाम पर बसते हैं आज सिर्फ हैवान यहाँ ।
वर्षा वार्ष्णेय अलीगढ़

Views 103
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Versha Varshney
Posts 13
Total Views 1.1k
कवियित्री और लेखिका अलीगढ़ यू पी !_यही है_ जिंदगी" मेरा कविता संग्रह है ! विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन ! साझा संकलन -१.भारत की प्रतिभाशाली हिंदी कवयित्रियाँ ! २.पुष्पगंधा pride of the women award 2017 Money is not important then love,bec love is God n God is our life . my blog -http://vershavarshney.blogspot.in/ my page -https://www.facebook.com/versha22.writer/?ref=aymt_homepage_panel .

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
4 comments
  1. अक्षरशः सत्य वर्षा जी । आज चारों तरफ मानवता बैआबरू हो रही, निर्मम कत्ल का शिकार हो रही है। मानवता की दहकती ज्वाला में रोटीयाँ सेकने की होड़ लगी है। आज भारतीय सभ्यता और संस्कृति रो रही है। सत्य विचार के लिए साधुवाद