‼‼ याद करो भई हनुमत गर्जन ‼‼

Abhishek Parashar

रचनाकार- Abhishek Parashar

विधा- मुक्तक

अनायास जब संकट घेरें, शत्रु बढ़े और मति फेरें,
और सतायें दुर्गुण का भय, याद करो भई हनुमत गर्जन ।1।
कोई काज न जब बन पाये, प्रति क्षण चिन्ता दें पीड़ायें,
और फँसो जब गह्वर में, याद करो भई हनुमत गर्जन।2।
विषादोन्मुख जब मन हो जाये, नेम करें कोई फल न आये,
विचित्र सी उलझन में फँस जाये,याद करो भई हनुमत गर्जन।3।
वाद-विवाद जब उलझाये, समय-समय पर रोग सताये,
विषय व्याधि जब टेर लगाये, याद करो भई हनुमत गर्जन।4।
जब पीड़ा दे वारि का भय, और सताये असमंजस का भय,
ऊँचा पर्वत भय उपजा दें, याद करो भई हनुमत गर्जन।5।
सुमति न आवे भय उपजावे, शक्तिहीनता पुनि तोहि सतावै,
ज्ञानहीन और बुद्धि भ्रमित हो, याद करो भई हनुमत गर्जन।6।
जबहिं सतावै सम्पत्ति का भय, हानि परे जब व्यापारन में,
और सतावै कन्दर्प का भय, याद करो भई हनुमत गर्जन।7।
राम नाम सुधि मन नहि आवे, चंचल मन यदि भजि चलि जावे,
योग न बने, न भजन बनावे,याद करो भई हनुमत गर्जन।8।

ऊपर लिखित कविता श्रद्धा का विषय है, अतः अधिक दिमाग का उपयोग न करें।(सब दिन रुरो परे पूरो जहाँ तहाँ ताहि,जाके हिय हुलसति हाँक हनुमान की)

##अभिषेक पाराशर##

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