ज़िन्दगी को ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी करते रहे

मुहम्मद आमिर क़मर सन्दीलवी

रचनाकार- मुहम्मद आमिर क़मर सन्दीलवी

विधा- गज़ल/गीतिका

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी करते रहे
बस यही इक काम था जो हर घड़ी करते रहे
:
मैं तो ग़म मे ड़ूब कर भी मौत से हारा नहीं
लोग खुशियों की हवस मे खुदकुशी करते रहे।
,
ख़त्म अपने प्यार का ये सिलसिला हो जाएगा
आप गर यूंही मुहब्बत में कमी करते रहे
:
आप ग़ाफ़िल ही रहे और देश सारा लुट गया
ये है मुजरिम वो है मुजरिम बस यही करते रहे
':
लो अमीरों के ये बच्चे घूम आये चाँद पर
मुफ़लिसों के बच्चे देखो काम ही करते रहे
:
मुल्क के अनपढ़ थे जितने सारे नेता बन गये
जो सियासत के थे क़ाबिल नौकरी करते रहे
:
आग यूं नफ़रत की फैली शहर सारा जल गया
तुम क़मर बस घर मे बैठे शायरी करते रहे

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मुहम्मद आमिर क़मर सन्दीलवी
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