ग़ज़ल (जिंदगी का ये सफ़र )

मदन मोहन सक्सेना

रचनाकार- मदन मोहन सक्सेना

विधा- गज़ल/गीतिका

कल तलक लगता था हमको शहर ये जाना हुआ
इक शक्श अब दीखता नहीं तो शहर ये बीरान है

बीती उम्र कुछ इस तरह की खुद से हम न मिल सके
जिंदगी का ये सफ़र क्यों इस कदर अनजान है

गर कहोगें दिन को दिन तो लोग जानेगें गुनाह
अब आज के इस दौर में दीखते नहीं इन्सान है

इक दर्द का एहसास हमको हर समय मिलता रहा
ये वक़्त की साजिश है या फिर वक़्त का एहसान है

गैर बनकर पेश आते, वक़्त पर अपने ही लोग
अपनो की पहचान करना अब नहीं आसान है

प्यासा पथिक और पास में बहता समुन्द्र देखकर
जिंदगी क्या है मदन , कुछ कुछ हुयी पहचान है

मदन मोहन सक्सेना

Views 31
Sponsored
Author
मदन मोहन सक्सेना
Posts 141
Total Views 1.5k
मदन मोहन सक्सेना पिता का नाम: श्री अम्बिका प्रसाद सक्सेना संपादन :1. भारतीय सांस्कृतिक समाज पत्रिका २. परमाणु पुष्प , प्रकाशित पुस्तक:१. शब्द सम्बाद (साझा काब्य संकलन)२. कबिता अनबरत 3. मेरी प्रचलित गज़लें 4. मेरी इक्याबन गजलें मेरा फेसबुक पेज : ( 1980 + लाइक्स) https://www.facebook.com/MadanMohanSa
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia