ग़ज़ल /गीतिका

kalipad prasad

रचनाकार- kalipad prasad

विधा- गज़ल/गीतिका

अब लूटपाट स्त्रीत्व हरण, सब चरम हुए
व्यभिचार छल कपट, यही सबके धरम हुए |
जब तेरी खिन्नता भरी आँखे भी’ नम हुए
समझा था’ दुःख तेरी’, यही तो भरम हुए |
थे महरबां कभी यहाँ भरपूर खूबियाँ
इस वक्त संत साधु भी’ अति बेरहम हुए |
वो चिडचिडा स्वभाव तेरा कर गया असर
दिल चूहा काँपता सदा ,डरपोक हम हुए |
कुछ कम हुआ तो’ कुछ में’ जियादा हुआ असर
दर सबकी ऊँची है, ज़रा मानव के कम हुए |
वो दौलते तमाम कमाई थी धोखे’ से
अब जब्त हो गए तो सरापा अलम हुए |
तेरी जाफा से’ और क्या’ नुकशान होना’था
मुझ पर तो’ वक्त का भी’ निराले सितम हुए |
सबके विलाप में भी’ हमारा विलाप था
इस भारती की’ गोद में सबके जनम हुए ||

कालीपद 'प्रसाद'

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kalipad prasad
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स्वांत सुखाय लिख्ता हूँ |दिल के आकाश में जब भाव, भावना, विचारों के बादल गरजने लगते हैं तो कागज पर तुकांत, अतुकांत कविता ,दोहे , ग़ज़ल , मुक्तक , हाइकू, तांका, लघु कथा, कहानी और कभी कभी उपन्यास के रूप में उतर जाते हैं | कवितायेँ कहानियाँ समाचार पत्रिका में प्रकाशित होती रहती है | दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुकी है | एक उपन्यास 'कल्याणी माँ' भी प्रकाशित हो चुका है | ये किताबे फ्लिप्कार्ट और अमेजोन

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