* ग़ज़ल :- *** फ़जल ****

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- गज़ल/गीतिका

फ़जल उनकी क्या असर कर गयी
मेरी ग़ज़ल जो ग़ज़ल बन गयी
सफ़ीना प्यार का उतारा किनारे
फिर मांझी न जाने कहां खो गयी
चाहा था बहुत चाहने वालों ने उनको
हमारी अदा क्या असर कर गयी
न सोचा था हमनें ऐसा भी होगा
जिंदगी कैसे सफ़र बन गयी
न जाने सफ़र में हमसफ़र बनकर
साथ हमारे वो कब हो गयी
आँखे हैं उनकी पयमाने माय के
उनकी नज़र कब असर कर गयी
यूं तो कभी हम पीते नहीं हैं मगर वो
ज़ाम-ए-नज़र से पिलाये तो क्या करें
ऐ वक्त ज़रा जीने दे मुझको
पयमाने मय के पीने दे मुझको
फजल उनकी क्या असर कर गयी
मेरी ग़ज़ल जो ग़ज़ल बन गयी ।।

👍मधुप बैरागी

Sponsored
Views 36
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
भूरचन्द जयपाल
Posts 409
Total Views 8.9k
मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia