ग़ज़ल।लौटा हूं मुहब्बत की दवा लेकर।

राम केश मिश्र

रचनाकार- राम केश मिश्र

विधा- गज़ल/गीतिका

ग़ज़ल।।लौटा हूं मुहब्बत की दवा लेकर।।

जफ़ा ग़मगीन महफ़िल से आया हूं मज़ा लेकर ।
गवां दी जिंदगी बेशक मुहब्बत की हवा लेकर ।।

रहा बेफ़िक्र हरपल मै किस्मत के इरादों से ।
बड़ी मुश्किल से ज़िंदा हूं शराफ़त की सज़ा लेकर ।।

नसीबो से मिले ज़ख़्मो को कैसे मैं भुला देता ।
सँजोये फ़िर रहा हूं मैं गुनाहों की अदा लेकर ।।

हुजूमे बावफ़ा देखा खफ़ा नफ़रत के मारे है ।
बहे है आँख से आंशू शरारत की जुबाँ लेकर ।

तुम्हे मालूम न होगा ग़म-ऐ -मंजर तबाही का ।
वफ़ा का क़त्ल करते है इशारों में नफ़ा लेकर ।।

गया मैं हार कर क़ोशिश रफ़ू दिल पर नही होता ।
कुरेदा तो लहू निकले नफ़ासत में रवां लेकर ।।

चले आओ वफ़ाई से मिलन रकमिश" अधूरा है ।
यकीं मानो मैं लौटा हूं मुहब्बत की दवा लेकर ।।

© राम केश मिश्र

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राम केश मिश्र
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राम केश मिश्र मैं भदैयां ,सुल्तानपुर ,उत्तर प्रदेश से हूँ । मैं ग़ज़ल लेखन के साथ साथ कविता , नवगीत, दोहे हाइकू, पिरामिड ,कुण्डलिया,आदि लिखता रहा हूं । FB-- https ://m.facebook.com/mishraramkesh मेरा ब्लॉग-gajalsahil@blogspot.com Email-ramkeshmishra@gmail.com Mob--9125562266 धन्यवाद ।।
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