(ीकहानी ) बदलते परिदृश्य

Geetesh Dubey

रचनाकार- Geetesh Dubey

विधा- कहानी

दृश्यावली
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1> शरद की बाइक स्टार्ट नही हो पा रही थी, ऒर आँफिस के लिये देर हो रही थी तो बाइक छोडकर निकल पडा। घर से निकलकर बाहर सडक पर आकर एक साइकल रिक्शा वाले को आवाज लगाई…
रिक्शा खाली है क्या?
हाँ बाबूजी कहते हुये रिक्शेवाला नजदीक आ गया
गोलछा चॊक चलेगा क्या, कितने पैसे लेगा?
पूछते हुये शरद करीब करीब रिक्शे मे बैठ ही गया।

बीस रुपये दे देना बाबूजी । कहते हुये रिक्शेवाले ने भी पैडल मारना शुरु कर दिया ।

अरे आजकल तुम लोगों ने बहुत भाव बढा रखे हैं, पंद्रह रुपये दूंगा।

गले मे लिपटे मैले गमछे से बह आई पसीने की धार को पोंछते हुये बोला आजकल मंहगाई का जमाना है बाबूजी इतनी दूरी के लिये बीस रुपये कहाँ ज्यादा हैं वैसे भी जबसे आँटो वालों का धंधा बढा है हम लोगों को सवारी भी कम मिलने लगी है।

ठीक है चल ज्यादा मत बता, मंहगाई हमारे लिये भी बढी है। अच्छा सुन आगे पान ठेले पर रोक लेना जरा सिगरेट लेनी है।

लो बाबूजी ले आओ, एक पान दूकान के सामने रोकते हुये कहा।

एक सिगरेट पैकेट देना, शरद ने सो सॊ के दो नोट पान वाले के काउंटर पर रखते हुये कहा

दूकानदार ने पैकट देकर कहा 195/- रुपये का है ऒर पाँच रुपये चिल्ल्रर नही है….
आँफिस जल्दी पहुचने के लिये फुर्ती से पैकट उठाकर रिक्शे की ओर मुडते हुये कहा, रखा रह पाँच रुपये कॊन मांग रहा है तुझसे…

चल जल्दी कहते हुये रिक्शे मे बैठते तक सिगरेट शरद के होठों पर सज चुकी थी। काफी देर से तलब लगी थी सिगरेट की, हाँ अब मजा आ रहा था धुंवा उडाने का ।

धुंवे के छल्ले उडाते उडाते रिक्शा भी आँफिस तक पहुंच चुका था, अब तक रिक्शेवाला भी पसीने से तर हो चुका था ।

2> शाम को आँफिस से घर लॊटते वक्त शरद ने सोचा चलो पैदल ही चला जाये, कुछ सब्जी भी लेनी है वैसे भी रिक्शे वाले लूटते बहुत हैं आलकल…

सबजी लेते आना लॊटते समय सीमा ने कहा था यह बात याद थी शरद को । सब्जी वाली की गुमटी मे पहुचकर आलू, प्याज, टमाटर, एक दो हरी सब्जी थोडी थोडी तुलवाई ऒर पूछा कितने पैसे?
सब्जी वाली ने हिसाब कर कहा अस्सी रुपये दे दो बाबूजी…
सो का नोट देकर शरद ने कहा लो ऒर बीस रुपये वापस करो, हाँ हरी धनिया व मिर्च भी डाल देना अपनी तरफ से, अस्सी रुपये की सब्जी जो ली है।

नही बाबूजी …..नही पडती! हम भी मोल खरीदकर लाते हैं कहो तो पाँच पाँच की डाल दूं….

डाल तो दो कहकर वापस दस रुपये जेब मे रखते हुये सब्जी का केरीबैग उठाकर बडबडाता हुआ चल पडा …

जिसे देखो वही लूटने मे लगा हुआ है आजकल…

थोडा आगे चलकर एक पसंदीदा दूकान के सामने शरद के कदम ठिठक गये फिर वह दूकान की ओर मुड चला…..
पूछा कितने का है इंग्लिश का क्वार्टर?
साढ़े तीन सॊ का .. दूकान के कर्मचारी ने बाकी की भीड को सामान देते हुये रूखेपन से कहा…
कोई परिचित न देख ले कही से तो जल्दबाजी मे पैसे चुकाकर , क्वार्टर को सब्जी की थैली मे सेट कर बढ चला ।

सोचते सोचते घर पहुच गया कि आज तो रंग जमेगा।
सीमा को सब्जी का थैला पकडाते हुये कहा मेरे लिये कुछ पकॊडे तल दे, सीमा भी समझ गई की आज …..

सबजी का थैला हाथ मे लेकर सीमा कहने लगी …..
सुनो जी आज कामवाली दो सॊ रुपये मांग रही थी कह रही थी कि लडके के लिये कुछ दवाई लानी है.,…
पर मैने तो साफ मना कर दिया कि आखिरी महीना चल रहा है कहाँ से लायें पैसे, क्या मै नही जानती ये कामवालियों के बहाने….

बिल्कुल ठीक किया तुमने… शरद ने कहा, इन लोगों के आये दिन यही नाटक हैं । कहाँ से देते रहें इन्हे पैसे कोई झाड़ लगा है क्या? कल ही देखो हम दोनो माँल मे फिल्म देखने गये थे खाना भी बाहर खाया था , अठारह सॊ रुपये खर्च हुये लेकिन मजा आ गया था बढिया मूवी थी, अब इन्हे कहाँ से दें…

तब तक सीमा ने गिलास लाकर सामने रखा ऒर कहकर किचन की ओर गई कि अभी हाजिर करती हूं पकॊडे…

शरद भी बोतल का ढक्कन खोल गिलास मे उडेलने लगा….इतनी देर मे पकॊडों से भरी प्लेट लाकर सीमा ने सामने रख दी।

गले के नीचे घूंट उतारकर पकोडे उठाते हुये शरद ने कहा तुम कितनी अच्छी हो डार्लिंग…

आप भी न…….शरमाते हुये कहा सीमा ने, अरे सुनो न आज मेरी सहेलियाँ बता रहीं थी कि एक बहुत बढिया साडियों की सेल आई है उसमे तीन हजार कीमत वाली साडियाँ सिर्फ सात सॊ रुपये मे मिल रही हैं, तो कल जाऊंगी ऒर रास्ते मे आपके लिये भी कुछ अच्छा सा नजर आया तो लेती अाउंगी…

तब तक एक पैग शरद के अंदर जा चुका था थोडा सुरूर भी चढने लगा था …

सीमा की तरफ अाँख दबाकर बोला. चले जाना, तुम्हारे लिये कोई बात है क्या….

गीतेश दुबे

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