हो जा दूर….

Rakesh kumar

रचनाकार- Rakesh kumar

विधा- कविता

हो जा अब दूर मुझसे,
मेरी ज़िन्दगी से,
मेरे सपनो से….

हो जा दूर अब मेरे अपनों से,
मेरे अर्पण से,
मेरे दर्पण से…

हो जा दूर अब इस शरीर se,
मेरे दिल से,
मेरे आत्मा से,
मेरी नज़रो से,
मेरी साँसों से,
मेरी धड़कन से,
मेरी आवाज़ों से,

हो जा दूर अब बस मुझसे,
और मुझसे जुड़े तेरे हर एक नातो से…

पर होती नहीं है तू दूर मुझसे,
गुनगुनाती रहती है प्रेम के संगीत
कभी फूल बन खिल जाती है दिल में,
कभी साँसों को ठंडक पहुंचती है.

पर होती नहीं है दूर तू मुझसे,
मेरे जज्बातो को, मेरे अरमानो को
अपने अंदर लपेट कर,
बेबस और लाचार मुझे बना जाती है.

पर फिर भी मंद मंद मुस्कुराता हु में,
यह सोच नादान है तू.
या सच्चे प्रेम से अनजान है.
जो खुशियां जो सपने सिजोय थे मैंने
वो सब थे तो बस तेरे.

में तो बस राही अलबेला हु,
ना मृत्यु का डर मुझे,
ना ज़िन्दगी का मोह.
मदमस्त हूँ दुनिया में अपनी
पिरोता रहता हूँ तेरे दिए सुख दुःख के दागों को

चाहता तो हूँ की दूर हो जा अब तू मुझसे,
पर अब दूर नहीं है तू मुझसे.

अंत भी तू और अनंत भी तू
शरीर भी तू और आत्मा भी तू
साहस भी तू और मज़बूरी भी
नज़दीकिया भी तू और दूरी भी.
समस्या भी तू है और समाधान भी

तू खुद तो हो जा दूर मुझसे,
पर मुझे बता में कैसे दूर करू तुम्हे खुदसे.

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