होली हैं (दोहे)

ramprasad lilhare

रचनाकार- ramprasad lilhare

विधा- दोहे

" होली है"(दोहे)
1.
खेलों सभी जन मिल के, होली का त्योहार।
भेदभाव सब छोड़ दो, छोड़ो सब तकरार।।

2.
लकड़ी ना जलाकर के, मन का बैर जलाय।
गुल की होली खेलिये, पानी दियो बचाय।।

3.
क्लेश द्वेष सब छोड़िये, मन का भेद मिटाय।
एेसी होली खेलिये, सब का मन हरसाय।।

रामप्रसाद लिल्हारे
"मीना "

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ramprasad lilhare
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रामप्रसाद लिल्हारे "मीना "चिखला तहसील किरनापुर जिला बालाघाट म.प्र। हास्य व्यंग्य कवि पसंदीदा छंद -दोहा, कुण्डलियाँ सभी प्रकार की कविता, शेर, हास्य व्यंग्य लिखना पसंद वर्तमान में शास उच्च माध्यमिक विद्यालय माटे किरनापुर में शिक्षक के पद पर कार्यरत। शिक्षा एम. ए हिन्दी साहित्य नेट उत्तीर्ण हिन्दी साहित्य। डी. एड। जन्म तिथि 21-04 -1985 मेरी दो कविता "आवाज़ "और "जनाबेआली " पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई है।

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