होली संजू बिन

मधुसूदन गौतम

रचनाकार- मधुसूदन गौतम

विधा- अन्य

उसको कितना था प्यार इस होली के त्यौहार से।
उठते ही जो सुबह सुबह ही आ जाता था प्यार से।
रंग उड़ाता मस्ती करता वो डांट मार भी खाता था।
प्यार लुटाता था वो सबको और प्यार भी पाता था।
मै बोलूं तू कब सुधरेगा रे संजू मुझको बतला दे।
बच्चो को क्या सिखलाएगा इतना तो तू समझा दे।
वो कहता फिर मुझसे ऐसे जीजू ,मै तो निपट अनाड़ी हूँ।
चला रहा बस जैसे तैसे अपने गृहस्थ की गाडी हूँ।
पर जीजू मेरे जीवन में यह थोड़ी सी जो मस्ती है।
इसको रहने दो यह पूंजी है मेरी दुनियां इस से चलती है।
दीदी डाटेंगी मारेगी तो मार में उसकी खा लूँगा।
हो जाएगा फर्श जो गंदा पौचा खुद ही लगा दूंगा।
पर होली तो खेलूँगा जी भर कर के मै इस घर में।
निकलो बाहर छिपे रहोगे आखिर कब तक बिस्तर नें।
और ना ना करते करते भी आलम रंग से भर जाता था।
क्या मजाल जो उसके रंग से कोई भी बच पाता था।
चला गया पर रंग उड़ा कर हम सब के ही जीवन से।
क्या राखी क्या दिवाली और होली सब चली गई ज्यो जीवन से।
गीली तो अब भी हो रही है चुनर धोती होली में।
पर यह पानी झरता है अब सबकी आँखों से होली में।
जीवन तो फिर भी जीवन है जीना ही जो पड़ता है।
रंग रीत का और प्रीत का जाने अनजाने डलता है।
एक किसी के संग में माना जीवन नही चला जाता।
पर बिन उसके जीवन भी क्या आखिर में है चल पाता।
बने मुबारक सबकी होली रंग बरसे जन जीवन में।
मौज मस्ती में जी लो प्यारे कब तक रंग है जीवन में।

******** मधु गौतम

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मुझे नियमो में बंधना नही भाता ।वो बात अलग है मैं नियमो से लिखता हूँ भी।
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