होली गीत – कान्हा पिचकारी मत मारे

sunil nagar

रचनाकार- sunil nagar

विधा- कविता

कान्हा मत मारे पिचकारी , थाने देवूँगी में गारी ,

चुनर थाने रंग दी म्हारी , मोहन मदन – मुरारी ,
तु तो कान्हा नंद को छोरो , मैं वृषभान दुलारी ,
थाने भरी है रंग पिचकारीईईई
क्यो मोहे पे डारी ||१||
ओ कान्हा मत मारे ———–

क्यो चुपके – चुपके तु आता , चुनर रंग में मोरी भिगोता ,
लाल , गुलाबी , नीला , पीला , क्यो केशरि़या रंग डारी ,
तु तो है ब्रज को कान्हा , मैं बरसाने की नारी ||२||
ओ कान्हा मत मारे ———-

कुंज – गलिन में बईया मरोड़े , दही माखन की मटकियाँ फोड़े ,
क्यो फोड़ी तुने मटकी कान्हा , देवेगी सास मोहे गारी ,
करूँ शिकायत मात यशोदा से , जाऊँ "सुनील" बलिहारी ||३||
ओ कान्हा मत मारे ——–

रचनाकार – सुनील नागर
ंा

Sponsored
Views 42
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
sunil nagar
Posts 2
Total Views 147
सुनील नागर खुजनेर राजगढ़ ( म. प्र.) एम. ए . - हिन्दी कार्य - अध्यापक हिन्दी , संस्कृत

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia