होली के रंग।

Rishikant Rao Shikhare

रचनाकार- Rishikant Rao Shikhare

विधा- शेर

उन गुलाबी चाँद के चेहरे पे थोड़ी रंग लगा देते,
आइ्ये घनी गर्दीसो के बीच बाते कुछ सजा लेते।
बस एक चाह हमारी भी थी उन दिनों तक,
जो तुम पास होते हम भी रंग-ए-जस्न मन लेते।

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Rishikant Rao Shikhare
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चुराकर दिल मेरा वो बेखबर से बैठे हैं;मिलाते नहीं नज़र हमसे अब शर्मा कर बैठे हैं;देख कर हमको छुपा लेते हैं मुँह आँचल में अपना; अब घबरा रहे हैं कि वो क्या कर बैठे हैं

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