होली के दोहे

Dr.rajni Agrawal

रचनाकार- Dr.rajni Agrawal

विधा- दोहे

होली पर दोहे प्रीत रंग भीगी धरा, रजनी दे सौगात। नेह सरस छिटकाय दो, बचे न कोई गात फाल्गुन में नीके लगें, हास, व्यंग्य ,परिहास। दो हज़ार सतरह रचे, होली का इतिहास।। तरुणाई महुआ सजी, टेसू धारे आग। लोकतंत्र में घुल गया, भगुआवादी फाग।। राधा चूनर राचती, कान्हा लाल गुलाल। ढ़ोल-नगाड़े बाजते,फाल्गुन हुआ निहाल।। जोगी सब भोगी हुए, देख फाग हुड़दंग। बरसाने की लाठियाँ,देवर -भाभी संग।। रंग सजा तन-मन खिला,तिलक राजता भाल। सरहद होली खेलता,मातृभूमि का लाल।। राग- द्वेष बिसराय के, ऐसी होली होय। निर्धन घर दीपक जले, बैर-भाव मन खोय।। डॉ. रजनी अग्रवाल"वागेदेवी रत्ना"

Sponsored
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Dr.rajni Agrawal
Posts 116
Total Views 3.5k
 अध्यापन कार्यरत, आकाशवाणी व दूरदर्शन की अप्रूव्ड स्क्रिप्ट राइटर , निर्देशिका, अभिनेत्री,कवयित्री, संपादिका समाज -सेविका। उपलब्धियाँ- राज्य स्तर पर ओम शिव पुरी द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार, काव्य- मंच पर "ज्ञान भास्कार" सम्मान, "काव्य -रत्न" सम्मान", "काव्य मार्तंड" सम्मान, "पंच रत्न" सम्मान, "कोहिनूर "सम्मान, "मणि" सम्मान  "काव्य- कमल" सम्मान, "रसिक"सम्मान, "ज्ञान- चंद्रिका" सम्मान ,

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia