“होली की कुण्डलियाँ “(कुण्डलियाँ छंद)

ramprasad lilhare

रचनाकार- ramprasad lilhare

विधा- कुण्डलिया

"होली की कुण्डलियाँ "
(कुण्डलियाँ छंद)
1.
सजना,सजनी से कहे, रंग न डालो मीत।
अबकी होली में प्रिये, कर मुझसे बस प्रीत।।
कर मुझसे बस प्रीत, साथ कभी ना छोड़ना।
जाये भी सब रूठ, तुम मुझसे ना रूठना।
हो सब तुझसे दूर, तु मुझसे दूर न रहना।
कहे रामप्रसाद, कहे सजनी से सजना।

2.
त्याग दो ऊँच निच सभी, छोड़ो सभी विकार।
बैर भाव सब छोड़ दो, रखो दिलों में प्यार।
रखो दिलों में प्यार, होली का त्योहार है।
करो आपस में प्यार, छाया बहुत खुमार हैं।
छोड़ो सब तकरार, सब को अब तुम प्यार दो।
कहे रामप्रसाद,ऊच नीच सब त्याग दो।

रामप्रसाद लिल्हारे
"मीना "

Views 2
Sponsored
Author
ramprasad lilhare
Posts 27
Total Views 341
रामप्रसाद लिल्हारे "मीना "चिखला तहसील किरनापुर जिला बालाघाट म.प्र। हास्य व्यंग्य कवि पसंदीदा छंद -दोहा, कुण्डलियाँ सभी प्रकार की कविता, शेर, हास्य व्यंग्य लिखना पसंद वर्तमान में शास उच्च माध्यमिक विद्यालय माटे किरनापुर में शिक्षक के पद पर कार्यरत। शिक्षा एम. ए हिन्दी साहित्य नेट उत्तीर्ण हिन्दी साहित्य। डी. एड। जन्म तिथि 21-04 -1985 मेरी दो कविता "आवाज़ "और "जनाबेआली " पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई है।
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia