हे प्रिये ! अपना कान लाओ तो जरा…

हरीश लोहुमी

रचनाकार- हरीश लोहुमी

विधा- कविता

हे प्रिये,
ये मेरे हस्ताक्षर की हुईं कुछ खाली चेकें हैं,
मेरे बैंक अकाउंट की स्टेटमेंट के साथ,
इन्हें तुम इस्तेमाल कर लेना,
जब-जब तुम्हारा हाथ तंग सा लगे तुम्हें ।

ये जमीन, ये मकान,
जो विरासत में मिले थे मुझे,
अपने बाप-दादाओं से,
इन सभी के कागजात,
ज्यों के त्यों रखे हैं लाल कपड़े में लिपटे हुए,
उस अलमारी में .
इन्हें तुम भी सौंप जाना नयी पीढ़ी को,
मेरे पूर्वजों की तरह ।

अब मैं सौंपना चाहता हूँ तुम्हें,
अपने जीवन में कमाए हुए,
अनमोल धन की चाभी,
इसे तुम केवल अपने दिल में रखना,
और दे जाना किसी अबोध को,
जो जीवन भर अबोध ही रहे,
एक निश्छल कवि की तरह ।

हे प्रिये,
अपना कान लाओ तो ज़रा,
मेरे मुँह के पास,
और ध्यान से सुनो,
यह है मेरा पासवर्ड,
sahityapedia.com का ।

***********************************************
हरीश चन्द्र लोहुमी, लखनऊ (उ॰प्र॰), संपर्क-9450630695
************************************************

Sponsored
Views 83
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
हरीश लोहुमी
Posts 24
Total Views 2.4k
कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने का प्रयास करता हूँ, परन्तु हारे हुए जुआरी की तरह पुनः इस चक्रव्यूह में फँसने का जी करता है ।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia