*** हे दीप देव !!!

दिनेश एल०

रचनाकार- दिनेश एल० "जैहिंद"

विधा- कविता

हे दीप देव !!!

हे दीप देव ! मन- मलिनता चूर करो ।।
अज्ञान रूपी मलेच्छ को अब दूर करो ।
हर घर का तुम क्लेश चकनाचूर करो ।
उपयोग फिर से निज का भरपूर करो ।।

कटुता, दुष्टता, मूर्खता सारे हाथ मलें ।
आप मग्न निज काज में सदा फूले-फलें ।।
दीप जले दीप जले घर-घर दीप जले ।
तिमिर भगाने को दीप जले नीम तले ।।

अंधकार को अग्नि जलाकर भस्म करो ।
दिए जलाकर अज्ञानता को नष्ट करो ।।
मानव को पुनः सुबुद्धि का प्रकाश दो ।
सत्-विचार, धर्म- सुकर्म की आस दो ।।

दीप रहित समूल धरती यह बेकार है ।
आप के बिना मेरे हृदय में अंधकार है ।।
आप लघु रूपी घर-घर का दिनेश हो ।
आप अंतिम आस जन-जन की शेष हो ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
14. 06. 2017

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दिनेश एल०
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मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि होने के कारण आगे चलकर साहित्य-लेखन काे अपने जीवन का अंग बना लिया और निरंतर कुछ न कुछ लिखते रहने की एक आदत-सी बन गई | फिर इस तरह से लेखन का एक लम्बा कारवाँ गुजर चुका है | लगभग १० वर्षों तक बतौर गीतकार फिल्मों मे भी संघर्ष कर चुका,,

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