हृदयाघात

पं.संजीव शुक्ल

रचनाकार- पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

विधा- कहानी

एक किसान प्रतीदिन सुबह घरवालों के जगने से पहले ही अपने खेतों पे निकल जाता और बेर ढले घर आता कुछ खाता और फिर खेतों पे निकल जाता और साम ढले ही वापस आता था।
उसे भी इस बात की इल्म न थी कि वो कितने वक्त से ऐसे ही अपने जीवन के स्वर्णीम पलों को जिन्हे वो जी भर कर जी सकता था खेतों के नाम कर चूका था या यूं कहें कि अपने बच्चो को एक सुन्दर व सुखद ऊच्चकोटि का भविष्य देने के नाम कर चूका था।
समय अपनी गती से बीतता रहा कठिन परीश्रम के बलबूते उस किसान ने अपने बेटे को पढा लिखा कर ऊची तालिम दिलाई। लड़का आई.एस कर जिले का कलेक्टर बन बैठा।
एक कलेक्टर के लिए रिश्ते भी बड़े – बड़े घरों से आने लगे। कलेक्टर साहब ने अपनी पसंद से मन मुताबीक जीवन संगीनी चूनी और शादी कर ली।
पत्नि जो शहरी लड़की थी उन्हे गवई
आबो हवाँ पसंद न आई कलेक्टर साहब को प्रोतसाहित कर या यूं कहें तिरीया चरित्र के वशीभूत कर शहर में घर खरीदवाकर वहीं रहने लगीं।
कुछ वर्षें बाद कलेक्टर साहब को पूत्ररत्न की प्राप्ति हुई पूरे शहर को आमंत्रण भेजा गया साथ ही साथ बहुत बड़े भोज का आयोजन हुआ, किन्तु कलेक्टर साहब अपने पिता को आमंत्रित करना भूल गये या फिर उन्हे वे अपने समाज "सोसायटी" के लायक ना समझ सके।
बात जिला कलेक्टर की थी अतः सोर हर ओर था, गांव के ही किसी ब्यक्ति ने उस किसान को उसके पोते की पैदाईस एवं वहाँ होने वाले भोज की सूचना दी।
पिता का हृदय यह भी न सोच सका की उसके बेटे ने तो उसे बुलाया तक नहीं है, आनन फानन में कुछ उपहार लेकर वो शहर को चल पड़ा, साम ढले किसान शहर अपने कलेक्टर बेटे के घर पहुंचा।
कलेक्टर साहब के घर शहर के जाने माने लोग आये चारो तरफ चहल पहल थी किसान की आंखे चहुओर अपने बेटे और बहू को ही ढूंढ रही थी किन्तु वे कहीं दिख ना रहे थे।
इस बीच एक अजीब अप्रत्यासित घटना घटित हुई कलेक्ट साहब ने अपने किसान पिता को देखा किन्तु अंदेखा कर बाकी मेहमानों की आगवानी करने आगे बढ गये।
सभी मेहमान आ गये थे सभी शहर के मदहस्त लोग थे,
जहाँ बड़े बड़े ढोल हों वहाँ टीमकी का भला क्या काम।
पार्टी प्रारंभ हो चूकी थी , मौज मस्ती का दौर पूरे सबाब पे था
हर ओर बीयर और सैम्पेन जैसे भारतीय संस्कृती का कब्र खोदने को आमादा हों, उसपर वेस्टर्न संगीत जैसे आग में घी।
पीने पीलाने, नाचने नचाने के बाद खाने का खिलाने का दौर प्रारंभ हुआ हर आदमी हाथों में प्लेट लेकर एक स्टाल से दुसरे और दुसरे से तीसरे स्टाल पे एक एक ब्यंजन लेकर खाने में मशगुल था ।
"बेचारा" किसान इन विसम परिस्थितीयों से अंजान हैरान परेशान एक कोने में खड़ा बस एक टक देख रहा था।
यहाँ अब तक जो कुछ भी घटीत हो रहा था वह सब उसके कल्पना से भी परे था। कहाँ गाँवों में पाँत में बीठा कर बड़े प्रेम से भोजन परोस कर कमी बेसी पूछ कर खिलाने का रीवाज और कहाँ यहाँ का भागमभाग में खूद से ले लेकर खाने का अजीबो गरीब प्रबन्ध वो खा न सका।
खाने खिलाने का यह दौर अब समाप्त हो चूका सभी पारितोसिक (गीफ्ट) दे रहे थे जीतना बड़ा आदमी उतना ही महंगा उपहार ।
आखिर बात कलेक्टर की थी सबको उनसे कोई न कोई काम तो पड़ना ही था सबके के सब अपना उल्लू सिधा करने में लगे थे।
भले ही उपहार अत्यधिक महंगे थे किन्तु इनमें प्रेम का पूट कही न था। मौकापरस्ती का गंध चहुओर बिखरा पड़ा था।
पर एक उपहार ऐसा अवश्य था जिसमें प्रेम का पूट, भावनाओं का सागर, आशीषों का भंडार भरा हुआ था।
किसान ने अपना उपहार बच्चे तक लेजाना चाहा किन्तु कलेक्टर साहब ने बीच में ही वो उपहार उसके हाथों से लपक लिया और एक तरफ उछाल दिया जैसे हीरे के बदले किसी ने कचरा पकड़ा दिया हो।
तभी किसी ने प्रश्न किया डी. एम सर कौन है यह आदमी जो तना घटिया उपहार लाया है इसे आपके स्टेट्स का भी भान नहीं।
कलेक्टर साहब ने अपनी पत्नि की तरफ देखा जिसकी भावभंगीमा यह बया कर रही थी कि की कोई जरुरत नहीं की इनसे रिश्ता क्या है वर्ना प्रतिष्ठा धूलधुसरित हो जायेगी।
कलेक्टर साहब ने तपाक से उत्तर दिया ये गांव से आये हुऐ है मेरे ड्राईवर के पिता है। मैं अपने नौकरों को भी घर के सदस्य जैसा ही समझता हूँ अतः उन्हे भी अपने रिश्तेदारों को बुलाने के लिए बोल दिया था।
इतना सुनना था किसान आंखो में आंशु लिए वहाँ से निकला और उसी रात अपने गांव के लिए प्रस्थान कर गया।
इस बात का इतना गहरा असर हुआ उसके मन मस्तिष्क पर की इसी हूक से वो बीमार पड़ा और कुछ दिन उपरान्त इस मौकापरस्त दुनिया को अलविदा कह गया।
©®पं.संजीव शुक्ल "सचिन"
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यहाँ मैं एक प्रश्न आप सभी से पूछता हूँ जो माता पिता अपने जीवन के हर सुखद पलों को त्याग कर अपने बच्चों के भविष्य को सवारते है तो क्या वो गलत करते है ?

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पं.संजीव शुक्ल
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मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।

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