हुंकार

dr. pratibha prakash

रचनाकार- dr. pratibha prakash

विधा- मुक्तक

कई छिपे गद्दार कन्हैया से घर में
कई ज़ाकिर कई मीर है
कहीँ सत्ता लोलुप आँखों में लालच की दिखती लकीर है
तक्षशिला को खो दिया कुछ जे.एन.उ.के आकाओं ने
किंतु अब भी चेतक भाला राणा का औ पृथ्वी के तीर है

ऐ पाक चीन है तुम्हे चुनौती
ज़न्नत मेरी कश्मीर है
लाख करो कोशिश मिल तुम दोनों
नहीं हरे द्रौपदी चीर है
है रक्त उबलता अब्दुल हमीद का सीमा पर
हर योद्धा भारत का भरी तुम पर,हर हुंकार बनी शूरवीर है

सादर भेंट

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dr. pratibha prakash
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Dr.pratibha d/ sri vedprakash D.o.b.8june 1977,aliganj,etah,u.p. M.A.geo.Socio. Ph.d. geography.पिता से काव्य रूचि विरासत में प्राप्त हुई ,बाद में हिन्दी प्रेम संस्कृति से लगाव समाजिक विकृतियों आधुनिक अंधानुकरण ने साहित्य की और प्रेरित किया ।उस सर्वोच्च शक्ति जसे ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड कहा गया है की कृपा से आध्यात्मिक शिक्षा के प्रशिक्षण केंद्र में प्राप्त ज्ञान सत्य और स्वयं को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ।
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