हिमालय

guru saxena

रचनाकार- guru saxena

विधा- अन्य

कुंदलता सवैया ( 8 सगण 2 लघु)
चलते नित हैं सत् के पथ में,
फिर हो किस भांति हमारी पराजय।
जिस ठौर रहें सब ताप सहें,
कुछ भी न कहें निर्लेप निरामय।
दिन रात लिए व्रत अंगद सा,
हम नाहिं करें क्षण को भी जरा भय।
नभ से कर बात खड़ा तनके,
प्रहरी बनके गिरिराज हिमालय।

Sponsored
Views 10
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
guru saxena
Posts 32
Total Views 378

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia