हिंदी दिवस पे हिंदी घुट-घुट के रो रही है

meenakshi bhasin

रचनाकार- meenakshi bhasin

विधा- कविता

हिंदी दिवस पे आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं
पर मुझे तो ऐसा लगता है कि हिंदी हमसे कुछ कह रही है—–

हिंदी दिवस पे हिंदी घुट-घुट के रो रही है,
बच्चों के रहते मां की क्या हालत हो रही है

दुनिया में जब थे तुम आए, मुझ में ही तो
की थी तुमने प्रथम वो अभिव्यक्ति,
विचारों की थी मैं वाहिनी, ख्वाबों का थी मैं ठिकाना
मन को बोलने की मैने ही दी थी शक्ति,
अब जो कुछ तुम बन गए हो
इंग्लिश से चिपक गए हो,
बुद्धि को दिया जिसने पोषण
उसी पे ताने कस रहे हो,
हिंदी दिवस पे चाहे कई प्रतियोगिताएं चल पड़ी हैं
मानसिकता में तो इससे आई न कोई कमी है,
हिंदी दिवस पे हिंदी यह शिकायत कर रही है
हिंदुस्तान में आखिर क्यों हिंदी सिसक रही है–

क्यों आज अपनी ही मातृ-भूमि में जन्म लेकर
भी अपनी भाषा में काम करने को चाहिए हमें प्रोत्साहन,
इनाम दोगे तो काम करेगें, न दोगे तो दे देंगे टेंशन,
कई साल बीत गए यारों अब तो न बनाओ बहाने
कुछ मौलिकता की धुन बजाओ, छोड़ो विदेशी धुनों पर नाच-गाने
अपनाओगे अपनी भाषा तो कुछ नया सा कर पाओगे
वर्ना जीवन भर दूजे की लिखावट को कॉपी ही करते जाओगे,
हिंदी दिवस पे हिंदी फरियाद सी कर रही है
अपना लो राजभाषा हिंदी, देश की प्रगति की भी यही रजा है—

मीनाक्षी भसीन© 14-09-17सर्वाधिकार सुरक्षित

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meenakshi bhasin
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मेरा नाम मीनाक्षी भसीन है और मैं पेशे से एक अनुवादक हूं। दिल्ली के एक सरकारी कार्यालय में काम करते हुए मुझे करीब सात वर्ष हो चुके हैं। मुझे लिखने का बहुत शौंक है और शायद इसलिए मैं अपना काम बहुत आनंद से करती हूं। मुझे अपना कार्य कोई बोझ नहीं बल्कि अपनी दिनचर्या का एक अहम हिस्सा लगता है। मेरा मानना है कि लेखनी की ताकत बोलने से कहीं अधिक होती है।

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