हास्य *लेख *”पगडण्डी पर बने स्लोप”*

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- लेख

एक रात रास्ते से ..गुजरते हुए,
मुश्किल में ..जान पड़ गई,
मोहल्ला भी ..अनजान था,
.
गुजरते तो ..सभी है,
पर मेरा पांव ..
स्लोप पर पड़ फिसल गया,
और धड़ाम से..गिर गया,
.
कोई पास न आया,
शायद ..सोचकर ..कि शराबी है,
.
हम क्यों ? उलझे भला ,
.
बेहोश समझ ..एक कुत्ता पास आया,
आदत से लाचार…. बेचारा,
आखिर वही काम आया,
उसी ने न जाने क्या ?? सूंघा ??
टांग उठाई…और मंत्र-सा पढ़ दिया !
.
होश में आया तो ..लोगों की भीड़ खड़ी थी,
.
सभी में व्यर्थ चर्चा ..हो रही थी,
मेरे घर भी ..खबर पहुंच चुकी थी,
.
मेरी ही चर्चा ..सबके मुख पर थी,
क्यों गिरा?
कैसे गिरा?
.
पर उस स्लोप पर
किसी की नजर नहीं पड़ी ,
जो रस्ते मे उसके नाम पर ईंटें खड़ी थी,
जिस कारण भीड़ जुड़ी थी,
.
दोस्तों दुनिया का दस्तूर निराला है,
ये दुनिया ऐसे ही चलती है साहेब !
.
बुरा बुरा सब कह ..बुराई देखे न कोई,
जो देख लें बुराई…..बुरा बचे न कोई,

साभार प्रस्तुत:-
डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,

Sponsored
Views 46
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Mahender Singh
Posts 70
Total Views 1.6k
पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia