हास्य-कविता: गधे से वकील

Radhey shyam Pritam

रचनाकार- Radhey shyam Pritam

विधा- कविता

मास्टर जी पढा रहे थे,एक बच्चे पर चिल्ला रहे थे,अरे मूर्ख पढता नहीं है,खेला करता है।
तू मुझे जानता नहीं,
मुझे पहचानता नहीं,
मैं गधे को आदमी बना सकता हूँ।
नाकों चने चबवा सकता हूँ।
पास से कल्लू भाई जा रहे थे।
मास्टर जी की बात सुन पा रहे थे।
कल्लू भाई चौंके,मास्टर को जा टोके।
मास्टर जी!आप गधे को आदमी बना सकते हो।
क्या मुझ पर यह कर्म फरमा सकते हो।
मेरे पास भी एक गधा है।
उसे आदमी बना दीजिए।
मुझ गरीब पर कृपा कीजिए।
मास्टर जी बोले,खुशी से डोले,
मैं तेरे गधे को आदमी बना दूँगा।
उसे रोजगार भी दिलवा दूँगा।
कसम से!जिंदगी बना दूँगा।
बस इतना-कर्म फरमा दीजिए।
गधे का एडमिशन करवा दीजिए।
एक साल बाद दर्शन दीजिए।
गधे को आदमी देख पाओगे।
रोजगार में देख फूले नहीं समाओगे।
कल्लू भाई ने गधे का एडमिशन करवाया।
मास्टर जी ने गधा बेच खाया।
एक साल बाद कल्लू भाई स्कूल आया।
मास्टर को देख मुस्कराया,लब हिलाया।
बोला मास्टर जी क्या मेरा गधा आदमी बनाया।
मास्टर जी मुस्कराए और बोले-
आदमी क्या तेरे गधे को रोजगार है दिलवाया।
कोर्ट में उसको वकील जो है मैंने लगवाया।
यह सुन कल्लू भाई फूला नहीं समाया।
उसके हृदय में खुशी का फूल खिल आया।
उसने मास्टर जी से पूछा।
मैं उसे कैसे पहचान पाऊँगा?
कैसे उसे प्यार से गले लगाऊँगा?
मास्टर जी बाले कोर्ट जाना।
वकील को हरी घास दिखाना।
प्यार से आवाज फिर लगाना।
वह पुरानी हरकत दोहराएगा,
आप उसे पहचान फिर जाना।
कल्लू भाई हरी घास ले पहूँचे कोर्ट में।
असंख्य वकीलों को देख चौंके कोर्ट में
हिम्मत कर एक वकील को घास दिखाई।
वकील ने गुस्से में आ जोर की लात जमाई।
कल्लू को गधे की पुरानी हरकत याद आई।
गुस्से में भर बोला-
कमबख्त,हरामी!
मैं हूँ तेरा स्वामी।
तू हो गया मुझपर आग-बबूला।
गधे से आदमी बनवा दिया,
वकील भी मैंने लगवा दिया,
पर लात मारना अब भी नहीं भूला।
लात मारना अब भी नहीं भूला।

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