हाल अब बदतर बहुत इस देश की आवाम का है

संदीप शर्मा

रचनाकार- संदीप शर्मा "माही"

विधा- गज़ल/गीतिका

हाल अब बदतर बहुत इस देश की आवाम का है
ढंग भी अबकी सियासत का किसी दिशनाम का है

छूट जाते है गुनाहों को छुपा के वो पलों में
मुल्जिमों को डर अदालत का यहाँ बस नाम का है

इस शहर में अब नही कोई कहूँ अपना जिसे मैं
बस उसी से चाह रखते लोग जो अब काम का है

बिक रहा है सच जहाँ में मखमली से बिस्तरों पर
अब यहाँ पर खेल तो बस कागजों के दाम का है

मत सहो अन्याय को तुम तोड़ दो सब बंदिशों को
बस यही पैगाम तो सारे जहाँ को राम का है

संदीप शर्मा "कुमार"

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