स्वतंत्र भावना से देखो-जीव के निज-धर्म,

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- कविता

पाखंड को विराम,
निज-धर्म को सलाम,

परोसा जाता है मांस और मदिरा-पान,
आशा शाकाहारी रखते है,
बातें हो रही भगवत दर्शन की,
विज्ञापन कामुक होते है,

किस विध फँसे,
मछली जाल में,
इसलिए आयोजन रखते है,
लीला दर्शन हो भले राम की,
रावण बन उभर आते है,

शुद्धि करने चले,
तन और मन की,
ध्यान धन पर ही रखते है,
रोज रखे या कभी-अभी,
रोजा का अर्थ कहाँ समझते है,

भौगोलिक स्थिति चाँद की
नाम ईद का रखते है,
करें संकल्प मजबूत
उत्पन्न हो निजता,
उद्देश्य से विमुख आयोजन,
आखिर हाथ खाली के खाली होते है,

स्वधर्म निजता का करें आगाज़,
देखो दुनियां में क्या क्या हो रहा है,
बहुत कम ही मनीषि और संत हुए है,
जिन्होने ये पाठ पढ़ाया है,
आज कर लो उनके पंथ को साकार,

डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
मानेसर, हरियाणा ।।

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Mahender Singh
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पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

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