स्टेशन मास्टर

dr. pratibha prakash

रचनाकार- dr. pratibha prakash

विधा- अन्य

कल एक संस्मरण पड़ रही थी यही फेसबुक पर जो रेलवे से सम्बंधित था ध्यान हूँ आरहा कि किसका था पर मेरे मन को छूट चला गया और 3जुलाई2014की घटना मेरी आँखों में फिर से घूम गई।
मैं नगल डैम के पास एक छोटे से गाँव मानकपुर में हूँ यहां से नांगल रेलवेस्टेशन लगभग 2 किमी है।उस रात मुझे ऊना हिमांचल एक्सप्रेस से दिल्ली और वहाँ से अलीगढ़ जाना था टिकिट थी मेरे पास,मैं जल्दी जल्दी सामान रख रही कि मेरी मित्र ने मुझे चादर रखने के लिए कहा मैं लेकर नहीं जाना चाहती फिर उसी ने सामान को सेट कर चादर डाल दी।मैंने रेलवे स्टेशन जाकर जैसे ही टिकिट देखा तो होश फाख्ता मेरा पर्स मेजपर ही रह गया।जाना अनिवार्य था ईश्वर को याद किया दिमाग ने काम किया टिकट खिड़की पर आकर टिकिट लेने की बजाय मोबाइल माँगा ,उसने बड़े ही अदब से मोबाइल दिया साथ ही टिकिट भी बोला रुपयों की चिंता न करो जाना जरुरी तो टिकिट लेलो औरगार्ड से बात कर लो।मेने दरबार फोन कर अपने पर्स की सूचना दी ताकि समय पर मुझ तक पहुच जाये 9:40 ट्रेन का समय था और 9:35 हो चुके थे गार्ड ,टी.टी.सी. दोनों ने मुझे स्टेशन मास्टर श्री राजीव रंजन जी के पास भेजा।मैंने उन्हें समस्या बताई और जाने की अनिवार्यता भी।ट्रेन का समय हो गया अभी तक मेरा पर्स मुझ तक नहीं आ पाया था रंजन जी ने 5 मिनट ट्रेन रोकने के लिए साफ मना कर दिया ट्रेन चल पड़ी और मैं बेहद परेशान, तभी रंजन जी पास आये और बोले
"जाना बहुत जरूरी है"
मैंने कहा जी
अचानक एक झटके के साथ उन्होंने मेरे हाथ में कुछ थमाया और तेजी धक्क सा देते हुए कहा जाओ ट्रेन पकड़ो मैं कुछ समझती तब तक s2 में खड़े टी.टी महोदय ने हाथ पकड़ कर ट्रेन में बिठा लिया था ट्रेन गति पकड़ चुकी थी जब तक मैं सामान्य हो पाती दो फौजी भाइयो ने हंसकर मुझे पानी की बोतल थमाई और बोले,
मैडम घबराइये मत भूल किसी से भी हो सकती है पर कार्य नहीं रुकना चाहिए।
मुझे अभी याद है टी टी कोई चौधरी जी थे उन्होंने कहा आज आप रेलवे के मेहमान ही सही और मुझे birth जो मेरी थी उपलब्ध करा दी।हाथ खोल देखा हाथ में रंजन जी ने पुरे 500 रूपये दिए पर ट्रेन लेट करने से मना कर दिया।मेरे घरवालों को सुचना मिल चुकी थी वे परेशान हो रहे थे कि मैं किसप्रकार बिना रुपयों मोबाइल टिकिट के घर पहुँचूंगी।मैं समय से पूर्व पहुंचीं और कार्य समाप्त कर सभी को इस अविश्वसनीय घटना से अवगत कराया।
सभी रंजन जी को साधू साधू कहने लगे।
वापस आकर जब स्टेशन पर मैंने उन्हें पूछा तो वे छुट्टी पर थे ।रेलवे स्टाफ ने मुझे बिठाया और कहा भी कि आप रूपये दे जाइये हम दे देंगे किन्तु मेरा मन मिलकर उनका धन्यवाद करना चाहता था अतः मैं समय लेकर 4 दी बाद गई उस दिन भी रंजन जी नही मिले फोन पर हमारी बात हुई
जी श्री मन आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
आपने मुझे बहुत बड़ी परेशानी से बचा लिया मैं आपसे मिलकर आपको शुक्रिया कहना चाहती हूँ।

रंजन जी, इसमें एहसान कैसा कभी आपने किसी की मदद की होगी आज आपकी हो गई नहीं की तो अब कर देना।वैसे भी मैडम कोई किसी के लिए कुछ नहीं करता परमात्मा ही किसी की वुद्धि पर विराजमान होकर कुछ करा लेता है।

मैनेफिर प्रश्न किया कि यदि मैनरूप्ये वापस नही करने आती या कोई फ्रॉड होती तो

रंजन जी बोले , मैडम ज़िन्दगी भर रुपयों के लिए भागते रहते है ईश्वर ने भलाई भी जीवित रखनी है 500 रूपये कोई बड़ी बात नहीं।किसी के काम आ सका ईश्वर का आभारी हूँ।

उसके बाद टिकिट खिड़की पर टिकिट के रूपये दिए तो मेरे अनुज की उम्र के उस लड़के ने जबाब दिया

अरे मैडम हम भी घर से बाहर रहते हैं मेरी ही बहिन अगर भी कहीं फंस सकती हैआप फोन भी ले जाते तो मुझे ईश्वर पर विश्वास था कि वापस जरूर आएंगे।

आज उस दिन के कारन मैं किसी विशेष समस्या से निकल पाई।
हे परमपिता परमेश्वर तेरा लाख लाख शुक्रिया
जो तूने आज भी इंसानियत के ज़ज़्बे को कायम किया हुआ है।बिना तेरी मर्ज़ी के इतने लोग मेरे सहयोगी नहीं बन सकते थे और सभी अजनबी।
अनाम टिकिट वाला भाई ,गार्ड,टीटी,और रंजन जी आप सभी मेरी जीत के हिस्सेदार है।
आप सभी का धन्यवाद और शुभकामनायें

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dr. pratibha prakash
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Dr.pratibha d/ sri vedprakash D.o.b.8june 1977,aliganj,etah,u.p. M.A.geo.Socio. Ph.d. geography.पिता से काव्य रूचि विरासत में प्राप्त हुई ,बाद में हिन्दी प्रेम संस्कृति से लगाव समाजिक विकृतियों आधुनिक अंधानुकरण ने साहित्य की और प्रेरित किया ।उस सर्वोच्च शक्ति जसे ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड कहा गया है की कृपा से आध्यात्मिक शिक्षा के प्रशिक्षण केंद्र में प्राप्त ज्ञान सत्य और स्वयं को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ।

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