सोनागाछी – कमाठीपुरा – जीबी रोड

सन्दीप कुमार 'भारतीय'

रचनाकार- सन्दीप कुमार 'भारतीय'

विधा- लेख

सोनागाछी – कमाठीपुरा – जीबी रोड

सोनागाछी – कोलकाता, कमाठीपुरा – मुंबई, जीबी रोड – दिल्ली, ये नाम बहुत जाने पहचाने से लगते हैं | इन पर कितने ही बार प्रोग्राम बने हैं और डिस्कवरी चैनल, नेशनल जियोग्राफिक चैनल पर कितनी ही बार टेलीकास्ट हुए हैं | कितनी ही बार खबरिया चैनलों पर प्राइम टाइम में स्पेशल रिपोर्ट दिखाई गयी है और न जाने कितनी ही बार समाचार पत्रों में इनके बारे में लिखा जा चुका है |

इनके नाम सुनकर लगता है ये जगहें बहुत खास होंगी | जरूर यहाँ पर कोई ऐतिहासिक धरोहर होगी जो सभी इस ओर खींचे चले आते हैं | लगभग पूरे देश में ये नाम जाने और पहचाने जाते होंगे | जितने भी वयस्क इन नामों से परिचित हैं वो ये भी जानते हैं कि इन जगहों का नाम इतना क्यों है ? जो लोग पहली बार दिल्ली, कोलकाता, मुंबई जाते हैं इन जगहों पर जाकर ज़रूर देखना चाहते हैं |

दरअसल ये नाम हमारे देश पर बदनुमा दाग हैं | जो एक ऐसे काम के नाम से जाने जाते हैं जो कि हमारे देश में अभी तक गैरकानूनी है | ये देहव्यापार की देश की सबसे बड़ी मंडियां हैं | यहाँ पर खुले आम जिस्मफरोशी का काला धंधा चलता है |

मुझे हैरानी होती है जब हमारे देश में देह व्यापार को कानूनी मान्यता ही नहीं है तो फिर ये इतने खुलेआम चल कैसे रहा है | जहाँ तक मेरा अंदाजा है दूर दराज के छोटे छोटे से गाँवों से भोली भाली लड़कियों को बहला फुसलाकर, नेपाल से तस्करी के माध्यम से, या कहीं से छोटी छोटी बच्चियों अपहरण करके, प्यार के जाल में फंसाकर यहाँ लाकर इस धंधे में डाल दिया जाता है और ये मासूम लड़कियां यहाँ नरक जैसी ज़िन्दगी जीने को मजबूर होती हैं |

कोलकाता और मुंबई तो मैं नहीं गया लेकिन मैं कुछ सालों तक दिल्ली में ज़रूर रहा हूँ | इस बीच मुझे एक बार जीबी रोड जाने का अवसर मिला | वहां जो मैंने देखा उसे देखकर मैं हैरान था | मैं अपने बॉस की गाड़ी से ड्राईवर के साथ उस रोड से निकला तो ड्राईवर ने मुझसे पूछा, " सर, आपको पता है ये कौन सी जगह है ?" मेरे न में जवाब देने पर उसने बताया कि हम जीबी रोड पर हैं | मैंने भी जीबी रोड का नाम पहले सुन रखा था लेकिन वहां जाने का पहला अवसर था | मैंने नजर उठाकर ऊपर खिडकियों की तरफ देखो | मैंने देखा, लगभग हर खिड़की पर लड़कियां और औरतों के समूह थे जिनका कमर से ऊपर का ही हिस्सा दिखाई दे रहा था | वो सभी लड़कियां/स्त्रियाँ अंतःवस्त्रों में खिडकियों के पास खड़ी थी और ग्रिल वाली खिडकियों से हाथ बाहर निकाल कर लोगों को अपने पास आने का इशारा कर रही थी | वही एक जगह का नजारा तो निराला ही था | उस जगह पर सड़क के एक तरफ खिडकियों से ये इशारेबाजी हो रही थी वहीँ सड़क के दूसरी ओर पुलिस चौकी भी थी |

ये देखकर तो मेरा सर ही घूम गया | ये क्या हो रहा है | मैं सोच रहा था क्या ये वाकई में गैरकानूनी काम है जो इतने खुले आम थाने के ही सामने चल रहा है | न जाने कितने ही परिवारों की इज्जत इन कोठों में क़ैद होंगी ? कितने ही परिवार अपनी बच्चियों के गुमशुदा होने की तारीख अभी तक याद करते होंगे ? क्या हमारा कानून इतना सस्ता है जो इन सबको इस नरक से मुक्ति नहीं दिलवा सकता बल्कि अपने ही सामने इस कुकृत्य को होते हुए देखता है |

इन जिस्म की मंडियों में रोज न जाने कितनी ही आहें और कराहें उठती होंगी और हर दिन कितने ही अरमानों का क़त्ल होता होगा | कितने ही ख़्वाबों की कब्रगाह होंगी ये मंडियां और इन जैसी और भी मंडियां | ये तो सिर्फ तीन नाम हैं, जो अक्सर सुनने में आते हैं | अभी कुछ दिनों पहले में एक लेख पढ़ रहा था जिसमे भारत की टॉप १० देह व्यापार मंडियों के नाम दिए थे | जब मैंने उसमे धर्मनगरी बनारस का भी नाम देखा तो मेरे आश्चर्य की कोई सीमा ही नहीं रही |अगर इन मंडियों की खाक छानी जाए तो कितने ही परिवारों की खुशियाँ लौट आयें और कितनी ही बच्चियों के लबों की मुस्कान वापस आ जाए |

मेरे मन में आज भी एक ही सवाल है जब जिस्मफरोशी गैरकानूनी है तब भी ये जिस्म की मंडियाँ कैसे इस तरह से बेख़ौफ़ होकर चल रही हैं |

ये विडियो मैंने नेट से साभार लिया गया है जो आपको जीबी रोड की कुछ झलक तो दिखला ही देगा :

www.punjabspectrum.co/misc/reality-gb-road-red-light-area-delhi/

सन्दीप कुमार
मौलिक, अप्रकाशित
(c) सर्वाधिकार सुरक्षित
ब्लॉग : sandeip01.blogspot.in/2016/06/blog-post_3.html

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सन्दीप कुमार 'भारतीय'
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3 साझा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं | दो हाइकू पुस्तक है "साझा नभ का कोना" तथा "साझा संग्रह - शत हाइकुकार - साल शताब्दी" तीसरी पुस्तक तांका सदोका आधारित है "कलरव" | समय समय पर पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित होती रहती हैं |

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6 comments
  1. सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने

  2. संदीप जी.. बहुत अच्छा लिखा है.. !
    लेकिन मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि आप किस समस्या को यहाँ पर बताना चाहते हैं..?? यह व्यवसाय गैरकानूनी है और इसे कानूनी जामा पहना देना चाहिए या यह व्यवसाय ही गलत है.

  3. मित्र पंकज जी,
    आपके प्रश्न का उत्तर बहुत ही विस्तृत है | ये तो आप जानते और समझते ही हैं कि ये काम एक आर्गनाइज्ड तरीके से किया जा रहा है, प्रशासन और कानून जब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं कर रहे हैं | बल्कि ये धंधा इन्ही की छत्रछाया में ही चल रहा है | एक बार जो महिला इस दलदल के धंधे में उतर जाती है वो दोबारा चाहकर भी नहीं निकल पाती | कई बार तो उस महिला के घरवाले ही अपनाने से इनकार कर देते हैं तो उस महिला के पास दोबारा वापस इसी दलदल में लौटने के कोई चारा नहीं रहता | अगर क़ानून के रखवालों की मंशा सही है तो ये सब चकले एक ही दिन में बंद किये जा सकते हैं |

    अगर इसको कानूनी घोषित किया जाता है तो परिस्थितियाँ काफी हद तक नियंत्रण में आ सकती हैं, सबसे पहले तो गैर कानूनी रूप से या जबरदस्ती इस धंधे में धकेली जाने वाली मासूम लड़कियों को इससे बचाया जा सकेगा, और जो भी ये धंधा करेंगी उनको बाकायदा लाइसेंस दिया जाएगा | इस व्यवसाय में लगी महिलाओं को शोषण से बचाया जा सकेगा और इनका जीवन स्तर सुधारा जा सकेगा | अगर लाइसेंस होगा तो उसके लिए एक प्रशासनिक अमला भी होगा जो इस बात पर नजर रखेगा कि किसी को जोर जबरदस्ती से इस व्यवसाय में नहीं लाया जा रहा | और भी बहुत सी बातें हैं मित्र जिन पर अलग से चर्चा की जा सकती है |

    वैसे मेरा मत है कि इसको कानूनी जमा पहनाना ही उचित होगा |