सोनपरी

Aruna Aggarwal

रचनाकार- Aruna Aggarwal

विधा- कविता

सोनपरी मैं सोनपरी, परियों के महल में रहती हूं, अम्बर छूने की आशा में बस पंख फैलाये उड़ती हूं सोनपरी मैं सोनपरी…..
आूँखें सूरज सी चमकीली, गालों पर सूरज की लाली, मुख पर सूरज का तेज लिए, सूरज से होड़ मैं करती हूं, सोनपरी मैं सोनपरी..
मेरे मन की कोई डोर नहीं, मेरे सपनों का कोई छोर नहीं,खुली हवा में पंछी सी, बादल को छू के निकलती हूं, सोनपरी मैं सोनपरी…..
बादल के उजले आँचल से, उजला मुझको सपना आया, सपनो की रंगी दुनिया से , जैसे इन्द्रधनुष भी शरमाया,
मेरे मन ने एक उड़ान भरी , एक झील किनारे मैं उतरी , कैसा वो सपन सुहाना था , उस झील में महल पुराना था,
उस महल में पंछी गाते थे , किन्नर गण गीत सुनाते थे , बदली बन खुशियां छाती थी बन बूँदें बरसी जाती थी,
धन धानो से भण्डार भरे , फल फूलों के बागान खड़े , जगमग करती हर एक दिशा, हीरे मोती हर ओर जडे ,
छम छम करती सखियाँ मेरी , खन खन करती खुशियां मेरी, कोना कोना उल्लास भरा , बस खाली था वो एक कमरा,
दरवाज़े से बिन आहट के , बिन दस्तक के , बिन हलचल के , उस कमरे में ज्यों कदम रखा , हर ओर मेरा ही अक्स दिखा,
आइनों की उस दुनिया में , सच्चाई जैसे चीख रही , हीरे मोती सब हवा हुए , एक दूजी दुनिया दीख रही,
इस दुनिया से अनजान हूं मैं , शायद इसमें मेहमान हूं मैं , वीराना है हर ओर जहां , सन्नाटा भी है शोर जहाँ ,
भूखे नंगो की भीड़ बड़ी , दाने दाने पर टूटी पड़ी , रोटी को तरसती आूँखों में , सपनो के लिए है जगह कहाँ ,
दुनिया के किस कोने में पड़ी , मेरी दुनिया से है कितनी बड़ी ? भूखों की ये गिनती सारी, ओह !! कैसी भयानक बीमारी !!
इस जगह से मुझको जाना है , मेरा घर वो महल पुराना है , खुशियां बसती हर ओर जहां, ऐसा संसार बनाना है ,
इंसानो से खाली बस्ती , जहां जान भी रोटी से सस्ती , सपनो में भी इस दुनिया में, मुझे वापस कभी न आना है,
अब…………………
उठ जा सोनू, उठ जा गुड़िया , मेरी चाँद सरीखी सी बिटिया , मेरी प्यारी जादू की छड़ी , सोनपरी मेरी सोनपरी ….
अगंड़ाई ले मैं उठ बैठी , फिर फटी फ्रॉक पर नज़र टिकी , माँ की धुंधलाती आूँखों से , सुई फिर बेईमानी कर बैठी,
मेरी आूँखों के सपनो में , माँ के सपने भी बसते है , पर दुनिया की सच्चाई में , बन आँसू आँख से गिरते है ,
सपनो के महल बनाने से , सच का सम्मान नहीं घटता , जिन आूँखों में दमके सूरज , वहां अँधेरा नहीं टिकता ,
मुझको अब काम पे जाना है , घर का सामान भी लाना है , इस "आठ बरस" की उम्र में भी , ये घर परिवार चलाना है,
हर घर में परियां बसती है , हर मन में खुशियां सजती है , अपने हिस्से की खुशियों को , मुझको ही ढूंढ के लाना है ,
सोनपरी मैं सोनपरी , परियों के महल में रहती हूँ …….

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