सोचकर देखो

Brijpal Singh

रचनाकार- Brijpal Singh

विधा- कविता

युग बदल रहा है तुम भी जरा बदल कर देखो मोह-माया से दूर कहीं सीधे चलकर देखो !

वक्त का सुरुर बहुत कुछ है कहता यहाँ , मंज़िल है कहाँ तुम बस ये सोच कर देखो !

आयेगा वक्त इस कदर तुम्हारा भी कभी, बडे हो गये हो ज़रा बडा सोचकर देखो !

मिलेगा यहाँ फरिश्ते की तरह कोई, अब की बार भरोसा करके तो देखो !

खुदा ने भेजा है तुम्हे किसी अच्छे कइ लिये यहाँ , इस कदर कभी खुद को समझकर तो देखो !

आस्था भी निराधार भक्ति भी जरुरी यहाँ, सयंम कभी तो कभी खुद को शांत करके तो देखो !

बदल गया यहाँ बहुत कुछ यहाँ, खुद को भरी नींद से जगा कर तो देखो !

.. ..बृज

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Brijpal Singh
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मैं Brijpal Singh (Brij), मूलत: पौडी गढवाल उत्तराखंड से वास्ता रखता हूँ !! मैं नहीं जानता क्या कलम और क्या लेखन! अपितु लिखने का शौक है . शेर, कवितायें, व्यंग, ग़ज़ल,लेख,कहानी, एवं सामाजिक मुद्दों पर भी लिखता रहता हूँ तज़ुर्बा हो रहा है कोशिश भी जारी है !!
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