सुमिरन

sudha bhardwaj

रचनाकार- sudha bhardwaj

विधा- लघु कथा

सुमिरन
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सागर किनारे खड़ा मैं इससे पहले की कुछ संभल पाता..
अचानक से लगभग बीस ….पच्चीस फुट ऊंची एक लहर ने मुझे अपने आगोश में ले लिया और मैं ना चाहते हुए भी लहरो के साथ बहता चला जा रहा था बचने के लिए काफी हाथ पॉव मारता रहा।थक गया और ड़ूबने लगा मैं बहुत बुरी तरह छटपटा रहा था…..वहॉ आस-पास कोई मेरी आवाज सुनने वाला कोई नही था। मैं समझ गया था कि मैं मौत के आगोश में हूॅ परन्तु मैंने साहस नही त्यागा चारो तरफ पानी ही पानी देखकर मेरी ज़बान पर बार-२उस ईश्वर का नाम आ ..रहा था। मैं बहुत देर छटपटाया परन्तु उसके बाद मैं ऊपर वाले से रहम की भीख मागी और फिर मैं नही जानता उस…… अथाह सागर में मुझे कौन….. बचाने आया क्योकि जब मेरी ऑख खुली तो मैं किनारे पर था तेज धूप से मेरी ऑखें चुंधियॉ सी गयी थी मैने होश आने पर एक बात का एहसास अवश्य हुआ…उस दिन मॉ की बात याद आयी वो हमेशा कहा करती थी अरे! भगवान हमेशा हमारे पास हमारे साथ ही रहते है। बस साहस के साथ लड़ते रहो। जब हमारे बस में कुछ…. नही रहता तो वो तुरन्त आकर हमारी मदद करते है।मैं हमेशा यही सोचता था कि माँ मेरा दिल बहलाने के लिए..
एेसी बातें करती रहती है। और ईश्वर तो सिर्फ मूर्तियों में रहते है। मैं एेसा कहकर माँ की बात
कभी ध्यान से नही सुनता था। लेकिन उस हादसे ने मुझे उस अदृश्य शक्ति को मानने लगा। जिसने आकर मुझे मौत के मुहँ में जाने से रोक लिया।और मैं आज जीता जागता तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। सच बताऊं उस वक्त अपने पूरे जीवन में मैंने सच्चे मन से भगवान को याद किया था।और वो आये और मुझे बचाया यह भी सत्य है।
परन्तु आज मेरा बेटा… ठीक मेरी तरह नही पापा ! आपको किसी आदमी ने ही
बचाया होगा।मैने उसे बताया अरे बेटा ! अगर आदमी ने भी बचाया तो वो मानव रूप में मुझे बचाने आये।
वो हमें हर विपदा से…. निकालते है परन्तु हम ही ऐसे है जो केवल उन्हे विपत्ति के वक्त ही याद करते है…..
ठीक कहते हो पापा….. हमारी हिन्दी टीचर ने भी हमे
पढ़ाया है।
दु:ख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दु:ख काहे को होय।

सुधा भारद्वाज
विकासनगर उत्तराखण्ड

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