सुन लो मोदीजी

विनोद कुमार दवे

रचनाकार- विनोद कुमार दवे

विधा- कविता

फिर से कुछ गीदड़ शेर का सीना छलनी कर गए,
मेरे वतन तेरे आँचल पर लहू के दाग नहीं सुहाते।
कितनी बार खा चुके है मात जंग के मैदान में,
ये कुत्ते मगर अपनी करनी से बाज नहीं आते।
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अब बातों से फिर हमे न बरगलाना मेरे सरकार,
हुक्मरानों की जुबां से बच्चा बच्चा वाक़िफ़ है।
शहीद आए है लिपट कर जिसमे अपने घरो को,
हर हिन्दुस्तानी उसी तिरंगे का आशिक है।

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'दवे'ये कलम तो तेरी खून के अश्क रो रही है,
मगर हिन्दोस्तां की बंदूके,तोपे,मिसाइले सो रही है।
हम कवि पृथ्वीराज है अपनी कलम रुकने नही देगे
प्रताप हो तुम,तुम्हे अकबर के सम्मुख झुकने नहीं देंगे।
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विनोद कुमार दवे
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परिचय - जन्म: १४ नवम्बर १९९० शिक्षा= स्नातकोत्तर (भौतिक विज्ञान एवम् हिंदी), नेट, बी.एड. साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।अंतर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरन्तर सक्रिय। 4 साझा संकलन प्रकाशित एवं 17 साझा संकलन प्रकाशन की प्रक्रिया में। अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत। मोबाइल=9166280718 ईमेल = davevinod14@gmail.com

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2 comments
  1. विनोद देव जी की यह रचना” फिर से कुछ गीदड शेर का सीना…” एक सशक्त व्यंग