सुन प्रीतम की बात….

Radhey shyam Pritam

रचनाकार- Radhey shyam Pritam

विधा- कुण्डलिया

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मेरे आशियाने में,प्यार सिवाय कुछ ना।
छोड चाहे तू अपना,ये अध्याय कुछ ना।।
ये अध्याय कुछ ना,कर्म बाजी मारें हैं।
अपनों के चेहरे,दिखें हार उतारें हैं।
सुन प्रीतम की बात,खुशी के रूप घनेरे।
माँ बाप गुरु से ही,खुशी पग चूमे मेरे।
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खुशी अपनों की गुलाब,रसपान करता रहूँ।
गुरु का ज्ञान सदैव ही,अधरों धरता रहूँ।।
अधरों धरता रहूँ,मेरा गुरु प्रभु सम है।
मिले शुभाशीष तो,जिंदगी में आलम है।
सुन प्रीतम की बात,मिली गुरु से सदा हँसी।
लख कुर्बानियों में,मैं चाहूँ थोडी खुशी।
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समता ना जाने कोय,आरक्षण घात रे।
स्वयं स्वार्थ में धसें,दीन की न बात रे।।
दीन की न बात रे,आत्मा निहारिए जरा।
कोई आगे बढे,उसको कहिए तुम खरा।
सुन प्रीतम की बात,दोषार्पण न है थमता।
पर स्वयं की भैया,रुह से देखिए क्षमता।
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भाईचारा बन रहे,भेदभाव मिटे तो।
चाँद-चाँदनी एक,सबकी सम रटे तो।।
सबकी सम रटे तो,बटवारा न कर भैया।
रब विधान सम रहा,शक्ति ना ता-ता थैया।
सुन प्रीतम की बात,शक्तियाँ बंधु गई आई।
अकेला अंत रहे,दंभ काहे का भाई।
******राधेयश्याम
******बंगालिया
******प्रीतम कृत
……….राधेयश्याम बंगालिया
……….प्रीतम कृत सत्य(कुंडलिया छंद)

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