सुनो बेटियों

डॉ गरिमा संजय दुबे

रचनाकार- डॉ गरिमा संजय दुबे

विधा- कविता

सुनो बेटियों

डॉ . गरिमा संजय दुबे

तुम हिमालय सी उत्तंग किंतू
तुम्हारा कद , तुम्हारे स्कर्ट के छोटे
होने पर निर्भर क्यों रहे ?
तुम हीरे सी प्रकाशवान किंतू
तुम्हारी चमक नकली जेवरों और
मेक अप की  मोहताज़ क्यों रहे ?
तुम आधुनिका , तुम सुपर वीमेन
फिर तुम्हे स्वतंत्रता के छदम् आवरण
क्यों ओढ़ना पड़े?
बन दुर्गा करती रहना संहार हर
अनीति अन्याय का ,
किंतू भटक न जाना कहीं अपनी
राह से , भूल न जाना भेद
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता का ,
शक्ति न बने बदले का हथियार
विकृत न हो सत्ता और अधिकार

न समझ लेना कि
पुरुष जैसा होना ही ,
स्वतन्त्र होना होता है ,
मत चलना इस शार्ट कट पर जहां ,
खो दोगी अपना नैसर्गिक नारीत्व
क्योंकि तुम सृजन हो ,
विध्वंस नहीं ,
तुम्हारा नारीत्व ही
है अंतिम आस
मनुष्यता के उज्जवल भविष्य की
खींच लाना है तुम्हे पुरुषों को ,
हिंसा और अभिमान के अंधे कुओं से ,
सिखलाना है नीति अनीति के भेद को ,
स्थापित करना है समता मूलक समाज
जहां गलत सबके लिए गलत हो ।

किंतू राह है कठिन ,
न होगा आसान लड़ना
पुरुष के दम्भ से ,
न होगा आसान लड़ना नारीवाद के
छदम् नारो से ,
तो डरकर कहीं छोड़ न देना आस ,
और पकड़ न लेना पुरुष होने की सरल राह ,
पुरुष होना बड़ा सरल है ।
रात को पब में नशा करते , गाली देते
हिंसा और ब्लैक मेलिंग के किस्से,
पल पल बॉय फ्रेंड बदलने को
न समझ लेना स्वतंत्रता ,
मत लेना पहन समझ
उन्हें आधुनिकता के मैडल ।
कुछ सरफिरे मार रहे है तुम्हारे सर पर ,
स्वतंत्रता के मखमल में लिपटा शोषण का जूता ।

निर्णय के सारे अधिकार तुम्हारे ,
क्या चाहती हो कीचड़ हो जाना ?
या कीचड़ में इतने कमल खिलाना
कि कीचड़ का अस्तित्व ही न रहे ।
सुन रही हो ना बेटियों ।

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