सुदामा/आत्म ज्ञान के पथिक, प्रेम की वसुंधरा वह

Brijesh Nayak

रचनाकार- Brijesh Nayak

विधा- कुण्डलिया

(1)
प्रेमी के हित कृष्ण ने, समता रख मान|
राज्यसभा से दौड़ कर, रखा सखा का मान||
रखा सखा का मान, दे दिया आधा आसन|
अश्रुधार बौछार, भाव से देखे शासन||
कह "नायक" कविराय, ज्ञान की मग के नेमी|
गहकर चेतन-लोक, बनो जागृत सह प्रेमी||

सह=समर्थ

(2)
मामा, सद् श्री कृष्ण के, कंस, अहं की खान|
भौतिकता की बाँह फँस, प्रेमहीन विज्ञान||
प्रेम हीन विज्ञान, स्वयं क्षतिमान बने हैं|
सूखे उर की शान,द्वंद का गाँव बने हैं||
कवि "नायक" कविराय भावमय ज्ञान-सुदामा
बन, गह योग सु कृष्ण , मरेंगे मद के मामा||

योग=तप और ध्यान

(3)
वह पंडित-चित् रूप सत्, नहीं जगत्-गति-दीन|
निर्धन कहना ठीक पर , ना दरिद्र की बीन||
ना दरिद्र की बीन, मुक्त जलभरी सुराही|
शास्त्रार्थ के बाद, गर्ग ने बेटी ब्याही||
कह "नायक" कविराय, बोधमय-अति आगर कह|
आत्म -ज्ञान के पथिक, प्रेम की वसुंधरा वह||

बृजेश कुमार नायक
जागा हिंदुस्तान चाहिए एवं क्रौंच सुऋषि आलोक कृतियों के प्रणेता

पंडित=विद्वान
चित्=आत्मा
सत्=सत्ता या अस्तित्व से युक्त
आगर=दक्ष

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Brijesh Nayak
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एम ए हिंदी, साहित्यरतन, पालीटेक्निक डिप्लोमा Ex State trainer, ex SPO NYKS UP, Govt of India Ex Teacher AOL1course VVKI "जागा हिंदुस्तान चाहिए" एवं "क्रौंच सुऋषि आलोक"कृतियाँ प्रकाशित साक्षात्कार, युद्धरत आम आदमी सहित देश के कई प्रतिष्ठित पत्र एवं पत्रिकाओ मे रचनाएं प्रकाशित अनेकों सम्मान एवं उपाधियों से अलंकृत आकाशवाणी से काव्यपाठ प्रसारित,नि.-सुभाष नगर, कोंच सम्पर्क 9455423376whatsaap9956928367

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