सिसकता बचपन

डॉ सुलक्षणा अहलावत

रचनाकार- डॉ सुलक्षणा अहलावत

विधा- गज़ल/गीतिका

इन सड़कों पर सिसकता बचपन देखा मैंने,
फटे कपड़ों से झांकता तन बदन देखा मैंने।

अपनी छोटी सी इच्छाओं को मन में दबाकर,
झूठी मुस्कान बिखेरता मायूस मन देखा मैंने।

जिसे बचपन में खेलना चाहिए खिलोनों से,
उसे कागज़ बीन कर कमाते धन देखा मैंने।

विद्यालय, मदरसे में जा कर पढ़ने की जगह,
दुकानों में गंवाता अपना बालपन देखा मैंने।

साहब! ये किस्मत की नहीं गरीबी की मार है,
करके मजदूरी करता जीवन यापन देखा मैंने।

किताबों के झोले की जगह जिम्मेदारी उठाए,
गरीबी की मार से तड़पता जीवन देखा मैंने।

सुलक्षणा पता नहीं कब बदलेंगे हालात यहाँ,
गरीबी की आग में झुलसता वतन देखा मैंने।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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लिख सकूँ कुछ ऐसा जो दिल को छू जाये, मेरे हर शब्द से मोहब्बत की खुशबु आये। शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार में अंग्रेजी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हूँ। हरियाणवी लोक गायक श्री रणबीर सिंह बड़वासनी मेरे गुरु हैं। माँ सरस्वती की दयादृष्टि से लेखन में गहन रूचि है।

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2 comments
  1. बहुत बहुत शुक्रिया जी

    ऐसे ही प्रोत्साहित करते रहिएगा जी