सियासत

MANINDER singh

रचनाकार- MANINDER singh

विधा- कविता

हर गली हर चोराहे में कितने खुल चुके है ठेके,
मुझे तो अपने ही घर से मद बू आ रही है,
स्कूल जर्जर हालत में, गिरने को तैयार,
ठेके कर दिए ऐ सी, सियासत लाखों कमा रही है,
सरकारी दफ्तरों में फाइलें दबी पड़ी इस आस में,
पगार के साथ, बच्चों की मिठाई फ्री आ रही है,
बुढ़ापा पेंशन, विध्वा पेंशन, सर्विस पेंशन,
बैंकों में हर रोज दम तोड़ती नज़र आ रही है,
बेरोज़गारी, महंगाई का युग बढ़ता ही जा रहा,
और भूखे पेट सियासत हमसे योग करवा रही है,
दम तोड़ रहा किसान, बंद होने को व्यापार,
जाने कैसे देश में तेजी की रफ़्तार आ रही है,
कोई लिखता ही नहीं रिपोर्ट पुलिस थानों में,
और सियासत बेटी बचाओ का कार्यक्रम चला रही है,
कितने ही गैर कानूनी संगठन के लोगो को,
कही मंत्री तो कही मुखी सियासत बना रही है
किसी मुद्दे पर दाल ना गली, तो कह दिया,
जो हो रहा पडोसी मुल्क की सियासत करवा रही है,
शख्श बदलते हर रोज सियासत की इस दुनिया में,
लिखते रहना "मनी" धीरे-धीरे ही सही लोगो को समझ आ रही है |

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MANINDER singh
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मनिंदर सिंह "मनी" पिता का नाम- बूटा सिंह पता- दुगरी, लुधियाना, पंजाब. पेशे से मैं एक दूकानदार हूँ | लेखन मेरी रूचि है | जब भी मुझे वक्त मिलता है मैं लिखता हूँ | मशरूफ हूँ मैं अल्फ़ाज़ों की दुनिया में....... cont no-9780533851

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