सिन्दूर की महिमा

कृष्ण मलिक अम्बाला

रचनाकार- कृष्ण मलिक अम्बाला

विधा- कविता

हर शादी शुदा बहन को समर्पित

नारी शक्ति हर पल कर रही
उंचाईयों के एलान
पर इस आधुनिकता की भाग दौड़ में
खो ली खुद की ही पहचान
देखा जग में फैशन का जलवा
तो मलिक ने किया आह्वान
शब्द तरंगों से जगाऊँ बहनों को
लौटा सकूँ उनकी असली पहचान
सिन्दूर की कीमत थी अनमोल कभी
आज रूप पर दाग लगता है
पर सुहागन लगती ही तभी मेरी बहना
जब सिन्दूर मांग में सजता है
फ़ैशन के चक्कर में मेरी बहना
सिन्दूर से हो दूर गयी
कभी कभी मानकर वक्त का कहना
लिपस्टिक मांग में लगाने को क्यों मजबूर हुई
इसकी महिमा का शास्त्र भी करे बखान
क्यों हो गयी बहना तू इससे आजकल अनजान
आज तेरे रूप पर सिन्दूर बन गया दाग कहीं
कभी होता था तेरे पति की दीर्घायु का राज यही
यदि तू देवी है नारी तो ये भी समझ ले
पति को भी मान कम से कम इंसान सही
भक्त ही है बेशक पति तेरा
पर बिना भक्त तो भगवन की भी पहचान नही
अभी भी वक्त है मान ले कहना
बचा ले अपनी मांग का असली गहना
आदमी औरत के वर्षों के भेद मिटाऊं
मलिक की है बस मांग यही
सिन्दूर की महिमा घर घर बतलाऊं
मिल जाये हर औरत को पहचान सही
सिन्दूर की महिमा घर घर बतलाऊं
मिल जाये हर औरत को पहचान सही

Written on 25.08.2016
Copyright to krishan malik ambala

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कृष्ण मलिक अम्बाला
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कृष्ण मलिक अम्बाला हरियाणा एवं कवि एवं शायर एवं भावी लेखक आनंदित एवं जागृत करने में प्रयासरत | 14 वर्ष की उम्र से ही लेखन का कार्य शुरू कर दिया | बचपन में हिंदी की अध्यापिका के ये कहने पर कि तुम भी कवि बन सकते हो , कविताओं के मैदान में कूद गये | अब तक आनन्द रस एवं जन जागृति की लगभग 200 रचनाएँ रच डाली हैं | पेशे से अध्यापक एवं ऑटोमोबाइल इंजिनियर हैं |

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5 comments
  1. मेरा विचार है कि यदि महिलाओं ने हड़प्पा सभ्यता से अर्थात 5000 वर्षो से इस परंपरा को आत्मसात किया तो यदि अब कोई आधुनिकता की और बढ़ना चाह रहा अथवा सिन्दूर की आवश्यकता को नकार रहा,तो चुकी पुरुषों की ये एक कीमती पूँजी है , उसे स्वयं इसका भार उठाना चाहिए और अपनी परंपरा और पूंजी को कम से कम हजार वर्ष तक ले जाने का शाहस तो दिखाये हो सकता है महिलाये ये प्रेम देख इसे पूण: स्वीकार लें l

  2. मृदुल जी बड़ा अच्छी प्रतिक्रिया दी।
    रचना तो उम्दा है पहली बार पति भक्ति भी करता
    है ।